Class 8 Sanskrit Chapter 10 :Hindi Translation– सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः)

संस्कृत साहित्य कथाओं का विशेष महत्त्व है । पञ्चतन्त्र और हितोपदेश की कथाएँ अत्यधिक लोकप्रिय हैं। प्रस्तुत पाठ मूलतः हितोपदेश से गृहीत है। प्रस्तुत कथा को दो भागों में विभक्त किया गया है।
एक बार शोभावती नगरी के राजा शूद्रक के यहाँ वीरवर नामक राजकुमार आजीविका के लिए आया। राजा ने उसे अपना सेवक नियुक्त कर लिया और उसके कार्य को सूक्ष्मता से परखने लगे।

एक दिन अर्धरात्रि में राजा को रोने की ध्वनि सुनाई दी। राजा ने वीरवर को रोने का रहस्य जानने के लिए आदेश दिया। वीरवर के पीछे-पीछे राजा भी चलने लगा। वीरवर को आगे चलकर एक रोती हुई स्त्री मिली जो राजलक्ष्मी थी। राजलक्ष्मी ने बताया कि देवी के अपराध के कारण राजा शूद्रक की मृत्यु हो जाएगी। उस स्त्री ने आगे बताया कि यदि वीरवर अपनी प्रिय वस्तु को देवी को भेंट में देता है तो राजा इस संकट से बच जाएगा।

(क) संस्कृतवाङ्मये कथासाहित्यस्य विशिष्टं स्थानम् अस्ति। कथानां द्वारा अतीव मनोरञ्जकतया जीवनसम्बद्धा: विविधाः उपदेशा:, प्रेरणाः हि एतस्य साहित्यस्य प्रयोजनम्। संस्कृतस्य कथासाहित्यम् अत्यन्तं समृद्धं वैविध्यपूर्णं च अस्ति ।

प्रस्तुतः पाठः ‘हितोपदेश:’ इत्यस्मात् कथाग्रन्थात् स्वीकृत: । राज्ञः शूद्रकस्य सेवायां नियुक्तस्य कस्यचित् वीरवरनामकस्य कर्तव्यनिष्ठस्य राजपुत्रस्य वैशिष्ट्यस्य वर्णनं कथायामत्र वर्तते। सः राज्ञः राष्ट्रस्य च रक्षणाय स्वप्राणान् अपि अर्पयितुम् उद्यतः अभवत् । तस्य स्वामिभक्तिः राष्ट्राय समर्पणभावः च प्रेरणार्हः । अत्र एषः पाठः भागद्वये अस्ति। पठनीया इयं वीरवरकथा । अनुकरणीयः अयं वीरवरः । (पृष्ठ 111 )

सरलार्थ – संस्कृत वाङ्मय में कथासाहित्य का विशेष स्थान है। कथाओं के द्वारा अत्यधिक मनोरञ्जकता से जीवन से सम्बद्ध विविध उपदेश, प्रेरणाएँ इस साहित्य का प्रयोजन है। संस्कृत का कथासाहित्य अत्यधिक सम्पन्न और विविधतापूर्ण है।
प्रस्तुत पाठ ‘हितोपदेश’ कथाग्रन्थ से गृहीत है। राजा शूद्रक की सेवा में नियुक्त किसी वीरवर नामक कर्त्तव्यपरायण राजकुमार की विशिष्टता का वर्णन कथा में यहाँ वर्त्तमान है। वह राजा की और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राणों को भी अर्पित करने के लिए तैयार हो गया। उसकी स्वामिभक्ति और राष्ट्र के लिए समर्पण भाव प्रेरणा के योग्य है। यहाँ यह पाठ दो भागों में है। वीरवर की कथा पढ़ने योग्य है। यह वीरवर अनुकरण के योग्य है।

(ख) आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी । तत्र शूद्रको नाम महापराक्रमी नानाशास्त्रवित् पूतचरित्रः महीपतिः प्रतिवसति स्म। अथैकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मादपि देशाद् राजद्वारमुपागच्छत्। तेन सह वेदरता नाम तस्य पत्नी, शक्तिधरो नाम सुतः, वीरवती नाम कन्या च समायाताः । (पृष्ठ 111 )

सरलार्थ – शोभावती नामक कोई नगरी थी। वहाँ शूद्रक नामक महान् वीर, अनेक शास्त्रों का ज्ञाता और पवित्र चरित्र वाला राजा रहता था। एक बार वीरवर नामक राजकुमार आजीविका के लिए किसी स्थान से राजदरबार में आया। उसके साथ वेदरता नामक उसकी पत्नी, शक्तिधर नामक पुत्र और वीरवती नामक कन्या आए ।

Class 8 Sanskrit Chapter 10 Hindi Translation सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः) Summary 1

(ग) वीरवरः – (प्रतिहारं वीक्ष्य) भोः प्रतिहार ! वृत्त्यर्थमागतो राजपुत्रोऽस्मि, तस्मान्नय मां स्वामिनः समीपम्।
(ततो दौवारिकः तं प्रभोः समीपम् अनयत् ।)
वीरवरः – ( प्रणामपुरस्सरं सविनयम्) देव ! यदि सौभाग्येन अहं भवतः सेवायां नियोजित: तर्हि यदादिश्यते तत् श्रद्धया पालयिष्यामि।
राजा – किं ते वर्तनम् ?
वीरवरः – प्रतिदिनं सुवर्णशतचतुष्टयं देव !
राजा – का ते सामग्री?
वीरवरः – इमौ बाहू, एष खड्गश्च ।
राजा – नैतच्छक्यम् !
(तत् श्रुत्वा वीरवरः राजानं प्रणम्य राजसभातः निर्गतः।)
मन्त्री – (तदालोक्य) देव ! दिनचतुष्टयस्य वेतनार्पणेन प्रथमं परीक्ष्यतां स्वरूपमस्य वेतनार्थिनो राजपुत्रस्य किमुपपन्नमेतत् वेतनं न वेति । अथ मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदानेन नियोजितोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरपतिना । स च राजपुत्रः प्रतिदिनं प्रभाते राजदर्शनादनन्तरं स्ववेतनस्य यच्छति देवेभ्यः अर्धम् । स्थितस्य चार्द्धं दरिद्रेभ्यो ददाति निक्षिपति च तदवशिष्टं भोज्यविलासव्ययार्थं पत्न्याः हस्ते। ततो धृतायुधः सः राजद्वारमहर्निशं सेवते। यदा राजा स्वयमादिशति तदा याति स्वगृहम् । अथैकदा कृष्णचतुर्दश्यामर्द्धरात्रे स राजा श्रुतवान् करुणरोदनध्वनिं कञ्चन । (पृष्ठ 112)

सरलार्थ-
वीरवर – (प्रतिहार को देखकर) अरे द्वारपाल ! मैं राजकुमार आजीविका के लिए आया हूँ। इसलिए मुझे स्वामी के पास ले चलो।
वीरवर – (तब द्वारपाल उसे स्वामी के पास ले गया ।)
राजा – (प्रणामपूर्वक विनय के साथ) महाराज ! यदि मैं सौभाग्य से आपकी सेवा में नियुक्त हो गया तो जो आदेश दिया जाएगा, उसका पालन श्रद्धा से करूँगा।
वीरवर – तुम्हारा वेतन क्या है ?
राजा – महाराज! प्रतिदिन सोने की चार सौ (मुद्राएँ) । तुम्हारी सामग्री क्या है ?
वीरवर – ये दो भुजाएँ और यह तलवार ।
राजा – यह सम्भव नहीं है। (यह सुनकर वीरवर राजा को प्रणाम करके राजसभा से निकल गया।)
मन्त्री – (यह देखकर) महाराज ! चार दिन का वेतन देकर इस वेतन के इच्छुक (व्यक्ति) के आचरण को पहले परख लीजिए। क्या यह वेतन उचित है या नहीं।

तब मंत्रियों के वचन से पानदान के द्वारा राजा द्वारा राजपुत्र वीरवर को नियुक्त कर दिया गया। वह राजकुमार प्रतिदिन प्रातः राजा के दर्शन के पश्चात् अपने वेतन का आधा देवताओं को देता है। शेष का आधा निर्धन लोगों को देता है और उसका शेष भोजन व विलास के खर्च के लिए पत्नी के हाथ पर रख देता है। तत्पश्चात् शस्त्र धारण करके वह रात-दिन राजदरबार की सेवा करता है। जब राजा स्वयं आदेश देते थे, तब अपने घर जाता है। तब एक बार कृष्ण पक्ष की चौदहवीं तिथि की आधी रात में राजा ने करुण रोने की आवाज सुनी

Class 8 Sanskrit Chapter 10 Hindi Translation सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः) Summary 2

(घ) राजा – कोऽत्र द्वारि तिष्ठति ?
वीरवर : – सेवको वीरवरोऽत्र द्वारि वर्त्तते देव !
राजा – क्रन्दनमनुसर राजपुत्र !
वीरवरः – यथादिशति देवः । (ततोऽसौ तद्रोदनस्वरम् अनुसरन् प्रचलितः ।)
राजा – स्वगतम्) नैष गन्तुमर्हति राजपुत्र एकाकी सूचिभेद्ये तिमिरेऽस्मिन्। तस्मात् अहमपि गच्छामि पृष्ठतोऽस्य, निरूपयामि च किमेतदिति।
(ततो नरपति: खड्गपाणिः तस्य अनुसरण- क्रमेण बहिः निरगच्छत् नगरीद्वारात्। अथ गच्छता राजपुत्रेण बहिः नगरादालोकिता रोदनपरा कापि सुन्दरी दिव्याभरणभूषिता।)
वीरवर: – का त्वमम्ब! किमर्थं विलपसि? (पृष्ठ 113)

सरलार्थ
राजा – द्वार पर कौन है ?
वीरवर – महाराज ! सेवक वीरवर यहाँ है।
राजा – रोदन के पीछे जाओ, राजकुमार।
वीरवर – महाराज ! जैसा आदेश देते हैं। (तब यह रोदन की ध्वनि का अनुसरण करता हुआ चल पड़ा।)
राजा – (अपने आप ) इस गहन अंधकार में अकेले राजकुमार का जाना उचित नहीं है। इसलिए मैं भी उसके पीछे-पीछे जाता हूँ और देखता हूँ कि यह क्या है?
(तब राजा हाथ में तलवार लेकर उसके अनुसरण क्रम से नगर से बाहर निकल गया। तब जाते हुए राजकुमार ने नगर से बाहर अलौकिक आभूषणों से सजी हुई रोती हुई किसी सुन्दर (स्त्री) को देखा।)
वीरवर – माता, तुम कौन हो? किसलिए रो रही हो?

(ङ) राजलक्ष्मीः – वत्स! अहमेतस्य भूपालस्य शूद्रकस्य राजलक्ष्मीरस्मि। चिरमेतस्य भुजच्छायायां सुमहता सुखेन निवसामि । साम्प्रतं तु देव्या अपराधेनाद्य प्रभृति तृतीये दिवसे राजा पञ्चत्वं यास्यति, तदाहमनाथा भविष्यामि। तदिदानीं नात्र स्थास्यामीति क्रन्दामि।
वीरवर: – (तदाकर्ण्य प्रणिपत्य) भगवति ! अस्त्यत्र कश्चिदुपायो येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति, सुचिरं जीवति च स्वामी?
राजलक्ष्मीः – अस्ति वत्स ! एकैवात्र प्रवृत्तिः, सा चातीव दुःसाध्या।
वीरवर: – (साष्टाङ्गं नमस्कृत्य) अम्ब! कथय, कः सः उपायः दुःसाध्यः ?
राजलक्ष्मीः – श्रूयतां पुत्र ! यदि त्वया स्वस्य सर्वतः प्रियं वस्तु सहासवदनेन भगवत्यै सर्वमङ्गलायै उपहारः क्रियेत, तदा पुनर्जीविष्यति राजा शूद्रको वर्षाणां शतम्, अहञ्च सुखेन निवत्स्यामि ।
(ततः सा तत्क्षणादेव गताऽदृश्यतां तत्सम्मुखात्।) (पृष्ठ 114)

सरलार्थ-
राजलक्ष्मी – पुत्र ! मैं इस राजा शूद्रक की राजलक्ष्मी हूँ । इसकी भुजाओं की छाया में अत्यधिक सुख से बहुत समय तक निवास करती रही। अब देवी के अपराध से आज से लेकर तीसरे दिन में राजा मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। तब मैं अनाथ हो जाऊँगी। इसलिए मैं यहाँ नहीं ठहरूँगी । इसलिए रो रही हूँ।
वीरवर – (यह सुनकर झुककर) हे भगवती ! क्या कोई उपाय है, जिससे भगवती का पुनः बहुत समय तक वास हो जाए और स्वामी बहुत समय तक जीवित रहें?
राजलक्ष्मी – है पुत्र ! एक ही आचरण है और वह बहुत कठिन है।
वीरवर – (साष्टाङ्ग प्रणाम करके) माता ! कहो, कौन-सा कठिन उपाय है?
राजलक्ष्मी – पुत्र, सुनिए । यदि तुम अपनी सबसे प्रिय वस्तु को हँसते हुए देवी सर्वमंगला के लिए भेंट देते हो तो राजा पुनः सौ साल तक जीवित रहेगा और मैं सुख से रहूँगी ।
(तब वह उसी पल उसके सामने से ओझल हो गई।)

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