Class 8 Sanskrit Chapter 7:Hindi Translation – मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा

संस्कृत भाषा प्राचीनतम और सर्व भाषाओं की जननी है। इसे गीर्वाणवाणी, देववाणी, सुरवाणी भी कहते हैं। ऋषि-मुनियों ने इस भाषा का विकास व विस्तार किया, तो कवियों और लेखकों ने अपने महानतम ग्रन्थों की रचना संस्कृत भाषा में कर इसका गौरव बढ़ाया। भारत के पावन ग्रंथ वेद-वेदान्त – पुराण – रामायण आदि सब संस्कृत में ही लिखे गए। भारतीय सभ्यता और संस्कृति के दर्पण इन पवित्र ग्रंथों के अध्ययन हेतु संस्कृत – ज्ञान अनिवार्य है। इसलिए प्रस्तुत कविता में कवि ने संस्कृत भाषा को ‘माँ’ कह सम्बोधित कर उसका यशोगान किया है।

(क) भगिनि ! अद्य श्रावणी पूर्णिमा अस्ति । वदतु एतस्याः किं वैशिष्ट्यम् ?
अहं जानामि अद्य संस्कृतदिवसः अस्ति। वयम् एतम्
आसप्ताहम् आचरामः।
सत्यम्। किं भवत्याः विद्यालये संस्कृतदिवसम् अधिकृत्य केषाञ्चन विशिष्टकार्यक्रमाणां योजना कृता?
आम् ओमिते! मम विद्यालये अनेकेषां कार्यक्रमाणां योजना रचिता । (पृष्ठ 75)

सरलार्थ:-
बहन! आज सावन (मास की) पूर्णिमा है। इसकी विशेषता बताओ।
मैं जानती हूँ आज संस्कृत दिवस है। हम इसका पूरे सप्ताह आचरण करते हैं

सत्य। क्या आपके विद्यालय में संस्कृत दिवस को आधार बनाकर किसी विशेष कार्यक्रम की योजना की।
हाँ ओमिता! मेरे विद्यालय में अनेक कार्यक्रमों की योजना बनाई है।

 

Class 8 Sanskrit Chapter 7 Hindi Translation मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा Summary 1

(ख) अहो एवम्! किं तत्र भवती भागं ग्रहीष्यति ?
आम् ओमिते! अहं तु गीतगायनप्रतियोगितायां भागं ग्रहीष्यामि ।
भगिनि ! अहमपि आगन्तुम् इच्छामि।
अवश्यम्। अहं भवत्याः कृते अधुना एव निमन्त्रणपत्रं यच्छामि।
भगिनि ! तत्र भवती किं गीतं गास्यति ? कृपया मामपि श्रावयतु ।
अस्तु अहं गायामि, भवति अनुगायतु। (पृष्ठ 75)

सरलार्थ:-
अहो, ऐसा है ! क्या वहाँ आप भाग लेंगी?
हाँ ओमिता! मैं तो गीतगायन प्रतियोगिता में भाग लूँगी।
बहन! मैं भी आना चाहती हूँ।
अवश्य! मैं आपके लिए अब ही निमंत्रणपत्र देती हूँ।
बहन! वहाँ आप क्या गीत गाओगी? कृपया मुझे भी सुनाओ।
हाँ, मैं गाती हूँ, आप पीछे गाओ।

(ग) मुनिवरविकसितकविवरविलसित-
मञ्जुलमञ्जूषा, सुन्दरसुरभाषा । अयि मातस्तव पोषणक्षमता
मम वचनातीता, सुन्दरसुरभाषा ॥१॥ (पृष्ठ 76

पदच्छेदः – मुनिवर – विकसित – कविवर – विलसित-मञ्जुल -मञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा । अयि मातः ! तव पोषणक्षमता मम वचनातीता सुन्दरसुरभाषा ।

अन्वयः – (त्वं) मुनिवरविकसितकविवरविलसितमञ्जुलंमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा (असि) । अयि मातः ! तव पोषणक्षमता मम वचनातीता अस्ति ।

सरलार्थ:- (तुम) मुनियों का विकास करने वाली, श्रेष्ठ कवियों को आनन्द देने वाली, सुन्दर (ज्ञान) पेटिका, देवताओं की सुन्दर भाषा हो । हे माता ! देवताओं की सुन्दर भाषा (हो) तुम्हारी पालनशक्ति वचनों से परे है (यानि वर्णन से परे है।)

भावार्थ:- संस्कृतभाषा अतीव सुन्दरभाषा देवभाषारूपेण च परिचिता अस्ति। मुनयः अस्याः संस्कृतभाषायाः विकासं कृतवन्तः। एषा भाषा भूयिष्ठानां भारतीयभाषाणां तथा विश्वस्य बहूनां भाषाणां च जननी – भाषा ( स्रोतो – भाषा) गुरुभाषा (पूरक – भाषा) वा अस्ति । बहवः कवयः काव्यरचनया अस्याः सौन्दर्यं वर्धितवन्तः। कोमलपदावल्या परिपूर्णा एषा ज्ञानपेटिका अस्ति। संस्कृतभाषा स्वपदावलिभिः अन्याः भाषाः ज्ञानं विज्ञानं च परिपोषयति। संस्कृतभाषायाः गौरवं वर्णनातीतम् अस्ति।

अर्थ- संस्कृत भाषा अत्यधिक सुन्दर भाषा देव भाषा रूप से परिचित है। मुनियों ने संस्कृत भाषा का विकास किया। यह भाषा अधिकतम भारतीय भाषाओं की, तथा विश्व की बहुत भाषाओं की जननी (माँ) अथवा गुरुभाषा ( पूरक – भाषा) है। बहुत कवियों ने काव्यरचना से इसके सौन्दर्य को बढ़ाया। कोमल पदावली से परिपूर्ण यह ज्ञान पेटिका है। संस्कृत भाषा अपनी पदावलियों (शब्दों की पंक्तियों) से अन्य भाषा ज्ञान और विज्ञान पोषित किया है। संस्कृत भाषा का गौरव वर्णनातीत (वर्णन से परे) है।

(घ) वेदव्यास- वाल्मीकि – मुनीनां
कालिदास – बाणादिकवीनाम् ।
पौराणिक – सामान्य जनानां
जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा॥२॥ (पृष्ठ 77)

पदच्छेदः- वेदव्यास – वाल्मीकि – मुनीनाम् कालिदास- बाणादिकवीनाम् पौराणिक – सामान्य जनानाम् जीवनस्य आशा सुन्दरसुरभाषा।

अन्वयः- (त्वं) वेदव्यासवाल्मीकिमुनीनां कालिदास- बाणादिकवीनां पौराणिक – सामान्यजनानां जीवनस्य आशा (असि)। त्वं सुन्दरसुरभाषा (असि ) ।

सरलार्थ:- (तुम) वेदव्यास वाल्मीकि मुनियों के, कालिदास बाण आदि कवियों के पौराणिक सामान्य लोगों के जीवन की आशा हो। तुम देवताओं की सुन्दर भाषा हो ।

भावार्थ:- संस्कृतभाषा अति रमणीया भाषा अस्ति । वाल्मीकि-वेदव्यास- इत्यादयः मुनयः रामायण-महाभारत- पुराणादीन् ग्रन्थान् रचितवन्तः । कालिदासः बाणभट्ट -प्रभृतयः विशिष्टाः कवयः अपि उपादेयानि काव्यानि रचितवन्तः । प्राचीनकालाद् आरभ्य इदानीं यावत् सामान्यजनानां जीवनं संस्कृतभाषया रचितैः काव्यैः प्रभावितम् अस्ति । संस्कृतभाषा बहूनां लक्ष्याणां प्रापिका अस्ति। अतः संस्कृतभाषा सुन्दरभाषा अस्ति ।

अर्थ- संस्कृत भाषा अति रमणीय भाषा है। वाल्मीकि-वेदव्यास इत्यादि मुनियों ने रामायण – महाभारत पुराण आदि ग्रन्थों को रचा। कालिदास-बाणभट्ट आदि विशिष्ट कवियों ने भी उपयोगी काव्यों की रचना की। प्राचीनकाल से शुरू कर अब तक सामान्य लोगों का जीवन संस्कृत भाषा से रचित काव्यों से प्रभावित है। संस्कृत भाषा बहुतों के लक्ष्यों को प्राप्ति कराने वाली है। अतः संस्कृत भाषा सुन्दर भाषा है।

(ङ) श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे ।
गति-मति – प्रेरक – काव्यविशारदे
तव संस्कृतिरेषा, सुन्दरसुरभाषा॥३॥ (पृष्ठ 78)

पदच्छेदः – श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे गति-मति – प्रेरककाव्यविशारदे तव संस्कृतिः एषा सुन्दरसुरभाषा।

अन्वयः – हे ! श्रुतिसुखनिनदे ! सकलप्रमोदे ! स्मृतिहितवरदे ! सरसविनोदे! गति-मति – प्रेरक – काव्यविशारदे ! तव एषा संस्कृतिः (अस्ति)। (त्वं) सुन्दरसुरभाषा (असि)।

सरलार्थ:- हे! कर्णप्रिय ध्वनि करने वाली! सबको आनन्द देने वाली ! 1. स्मरणशक्ति के लिए वरदान देने वाली 2. मधुर विनोद करने वाली ! गति – मति (बुद्धि) की प्रेरक काव्यों में पारंगत कराने वाली ! तुम्हारी यह संस्कृति (है) (तुम) देवताओं की सुन्दर भाषा हो ।

भावार्थ:- वस्तुतः रमणीया देवत्वविधायिनी संस्कृतभाषा संस्कृते: जननी सदृशी अस्ति। संस्कृतभाषायाः ध्वनिश्रवणेन सुखं वर्धते, सर्वे जनाः आनन्दिताः भवन्ति । संस्कृतभाषा वररूपेण संस्कारजन्यं ज्ञानं प्रयच्छति, सरसं विनोदभावं च प्रकाशयति । मानवजीवने उत्तमां गतिं बुद्धिं च प्रददाति । काव्यशास्त्रपरिपूर्णा संस्कृतभाषा अस्माकं संस्कृतिं रक्षति प्रसारयति च ।

अर्थ- वास्तव में रमणीय देवत्व को निर्धारित करती संस्कृत भाषा संस्कृति की जननी समान है। संस्कृतभाषा की ध्वनि सुनने से सुख बढ़ता है, सभी लोग आनन्दित होते हैं। संस्कृत भाषा वरदान रूप से संस्कार देने वाला ज्ञान देती है, सरस और विनोद भाव प्रकाशित करती है। मानव जीवन में उत्तम गति और बुद्धि देती है। काव्यशास्त्रों से परिपूर्ण संस्कृत भाषा हमारी संस्कृति की रक्षा और प्रसार करती है।

(च) नवरस – रुचिरालङ्कृति-धारा वेदविषय- वेदान्त-विचारा |
वैद्य – व्योम-शास्त्रादि-विहारा
विजयते धरायां, सुन्दरसुरभाषा ॥४॥ (पृष्ठ 79)

पदच्छेद:- नवरस – रुचिरा अलङ्कृति – धारा वेदविषय- वेदान्त-विचारा। वैद्य-व्योम – शास्त्रादि – विहारा विजयते धरायाम् सुन्दरसुरभाषा।

अन्वयः- नवरस-रुचिरा अलङ्कृतिधारा वेदविषयवेदान्तविचारा वैद्यव्योमशास्त्रादिविहारा धरायां सुन्दरसुरभाषा विजयते ।

सरलार्थः – नौ रसों से आनन्द देने वाली, अलङ्कारों को धारण करने वाली हो । वेदों के विषय, वेदान्तों के विचार वैद्य और अन्तरिक्ष के शास्त्र आदि (संस्कृतभाषा में ही ) विहार करते हैं। धरती पर देवताओं की सुन्दर भाषा विजयी है।

भावार्थः- संस्कृतकाव्यशास्त्रेषु शृङ्गार – हास्य- करुण-रौद्र -वीर-भयानक-बीभत्स – अद्भुत – शान्त-प्रभृतयः नवसंख्याकाः रुचिराः रसाः सन्ति। शब्दार्थपूर्णाः विविधाः अलङ्काराः शोभन्ते । वेद-उपनिषद्-वेदान्त-पुराणादीनां विचाराः जनान् अभिप्रेरयन्ति । चिकित्साविज्ञान-खगोलशास्त्रादिभिः सह संस्कृतभाषा पृथिव्यां विहरति । एवं संस्कृतभाषा सर्वत्र विजयते ।

अर्थ- संस्कृत के काव्य और शास्त्रों में शृङ्गार हास्य-करुण- रौद्र-वीर-भयानक-वीभत्स – अद्भुत – शान्त आदि नौ रुचिकर रस हैं। शब्दार्थों से पूर्ण अनेक अलङ्कार शोभा पाते हैं वेद-उपनिषद-वेदान्त-पुराण आदि के विचार लोगों को प्रेरणा देते हैं। चिकित्सा विज्ञान – खगोल शास्त्र ( आकाशीय शास्त्र) आदि के साथ संस्कृत भाषा पृथ्वी पर विहार करती है। इस प्रकार संस्कृत भाषा सर्वत्र विजयी है।

 

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