इस भारतभूमि पर समय-समय पर अनेक विद्वानों, समाज-सुधारकों, मानवतावादी महापुरुषों और देशभक्तों का अवतरण होता रहा है। गोपबन्धुदास एक महान् समाज सेवक और देशभक्त थे। ये सत्यवादि – वनविद्यालय के अध्यापक थे। उनका जन्म उड़ीसा प्रान्त के पुरी जनपद के सुआण्डो ग्राम में हुआ। उन्होंने छात्र जीवन से ही निर्धन व रोगी लोगों की सेवा आरम्भ कर दी । वनविद्यालय में उन्होंने छात्रों को निःशुल्क पढ़ाया। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया। वे कई बार जेल गए। इस प्रकार यह महामानव सभी के लिए आदरणीय हैं। उनके प्रेरणादायक वचन आज भी जनमानस में राष्ट्रभक्ति को जगाते हैं।
) (एकदा जलप्लावपीडितानां साहाय्यार्थं शिक्षकाः छात्राश्च सभागारे चर्चां कुर्वन्ति ।)
नमस्ते छात्राः! ह्यस्तनीं वार्तां श्रुतवन्तः किम् ?
नमो नमः आचार्य! ओडिशा – राज्यस्य केन्द्रापडा- जनपदे महानद्यां भयङ्करः जलप्लावः सम्भूतः जलप्लावेन तत्र महती हानिः सञ्जाता।
आम्, हिमानि ! त्वं सत्यं वदसि । जलप्लावेन वासगृहाणि नष्टानि, केचित् अस्वस्था : चिकित्सालये मृत्युना सह युध्यन्ते। अन्ये च अनाहारेण कष्टं सहन्ते । बहवः गृहपालिताः पशवोऽपि नदीस्त्रोतसा प्रवाहिताः मृताश्च।
महोदय ! ते सम्प्रति अतिदुःखिताः भवेयुः खलु ? (पृष्ठ 36)
सरलार्थ – – छात्रों, नमस्ते। क्या कल के समाचार सुने हैं?
आचार्य! नमस्कार। उड़ीसा प्रान्त के केन्द्रापडा जनपद के महानदी में भयंकर बाढ़ आ गई। बाढ़ से वहाँ बड़ी हानि हुई है
हाँ, हिमानी! तू सत्य कहती है। बाढ़ से निवास स्थान नष्ट हो गए। कुछ अस्वस्थ हस्पताल में मृत्यु के साथ लड़ रहे हैं। अन्य (लोग) आहार के अभाव से कष्ट सहते हैं। घर में पाले गए अनेक पशु भी नदी के बहाव में बह गए तथा मर गए ।
महोदय ! वे तो अब अत्यधिक दु:खी होंगे।

(ख) सत्यम्, अशोक ! ते सर्वे अतिदुःखेन जीवन्ति । अस्माभिः एतादृशानां दुःखितानां सहायता करणीया । यथा उत्कलमणिः गोपबन्धुः जलप्लावपीडितानाम् अकुण्ठं सेवां कृत्वा अद्यापि जनमानसेषु समादृतोऽस्ति ।
महोदय ! एषः गोपबन्धुः कः ?
भवन्तः सर्वे एतत् चित्रं पश्यन्तु । एषः अस्ति दीनबन्धुः गोपबन्धुः। सम्प्रति वयं तस्य विषये जानीमः। (पृष्ठ 37)
सरलार्थ –
अशोक ! सत्य है। वे सभी अत्यधिक दुःख के साथ जी रहे हैं। हमें ऐसे दुःखियों की सहायता करनी चाहिए। जिस प्रकार उड़ीसा की शोभा, गोपबन्धु बाढ़ पीड़ितों की आग्रहपूर्वक सेवा करके आज भी जनमानस में आदरणीय हैं।
महोदय! ये गोपबन्धु कौन हैं?
आप सभी यह चित्र देखें। यह ही दीनबन्धु गोपबन्धु हैं। अब हम उनके विषय में जानेंगे।
(ग) एकदा आचार्यहरिहरदासः सत्यवादि-वनविद्यालयस्य सर्वान् अध्यापकान् भोजनाय आमन्त्रितवान् । आमन्त्रिताः सर्वे अतिथयः हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः । बहूनि सुस्वादूनि व्यञ्जनानि कदलीपत्रेषु परिवेषितानि । हसन् गोपबन्धुरवदत् – अरे !
भोजनस्यातिदौर्लभ्यं जीवनाय सुखप्रदम् ।
तदर्थं भोजनं कुर्याः मा शरीरे दयां कुरु ॥ (पृष्ठ 38)
अन्वयः- भोजनस्य अतिदौर्लभ्यम् । जीवनाय सुखप्रदम् । तदर्थं भोजनं कुर्याः । शरीरे दयां मा कुरु ।
सरलार्थ – एक बार आचार्य हरिहरदास ने सत्यवादि वनविद्यालय के सभी अध्यापकों को भोजन के लिए बुलाया । बुलाए गए सभी अतिथि हाथ-पैर धोकर आसनों पर बैठ गए। केले के पत्तों पर अत्यधिक स्वादिष्ट अनेक व्यंजन परोसे हुए थे। हँसते हुए गोपबन्धु ने कहा – अरे, भोजन की अत्यधिक दुर्लभता है। जीवन के लिए सुखप्रद है। इसलिए भोजन करो। शरीर पर दया मत करो ।

(घ) एतच्छ्रुत्वा सर्वे उच्चैः हसितवन्तः । तदानीमेव बहिः कश्चन करुणध्वनिः गोपबन्धोः कर्णयोः अगुञ्जत्-“मातः, मातः ! बुभुक्षितोऽस्मि, कृपया किञ्चित् भोजनं देहि । दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम् । भोजनं देहि मातः ! भोजनं देहि। आँ आँ …” इति क्रन्दनध्वनिं श्रुत्वैव दयाविगलितहृदयः गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत् । किमपि अविचिन्त्य झटिति स्वस्मै परिवेषितं भोजनं हस्ते गृहीत्वा बहिरागतवान्। भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान्। (पृष्ठ 38 )
सरलार्थ – यह सुनकर सभी जोर से हँसने लगे। उसी समय ही गोपबन्धु के कानों में बाहर कोई करुणध्वनि गूँजी – हे माता ! मैं भूखा हूँ। कृपया कुछ भोजन दे दो । तीन दिन से कुछ नहीं खाया है। हे माता ! भोजन दे दो। भोजन दे दो। औँ। औँ। इस प्रकार रोने की आवाज सुनकर दया से जिसका हृदय पिघल गया था, ऐसा गोपबन्धु के नेत्र आँसुओं से भर गए। कुछ भी न सोचकर शीघ्र अपने लिए परोसे गए भोजन को हाथ में लेकर बाहर आ गए और भिक्षुक को दे दिए।
(ङ) असौ महान् समाजसेवकः आसीत् गोपबन्धुदासः । असौ सत्यवादि-वनविद्यालयस्य अध्यापकः, प्रसिद्धेषु पञ्चमित्रेषु अन्यतमः स्वतन्त्रतासङ्ग्रामी चासीत् । ओडिशाराज्यस्य पुरीजनपदस्य साक्षीगोपालसमीपे सुआण्डो-ग्रामे जन्म लब्धवान्। अध्ययनकालादेव स दरिद्राणां रोगिणां च सेवामकरोत् । सत्यवादि-वनविद्यालये स छात्रान् निःशुल्कम् अपाठयत्। निरक्षरतादूरीकरणाय सः सततं यतते स्म । कार्पासवस्त्रनिर्माणाय सः स्वयमेव सूत्रप्रस्तुतिमकरोत् । जन्मभूमेः दुर्दशामवलोक्य स सर्वदा चिन्ताकुलो भवति स्म । महात्मगान्धेः प्रेरणया भारतीयस्वतन्त्रतान्दोलने गोपबन्धुः भागं गृहीतवान्। सः वर्षद्वयं यावत् कारावासं प्राप्तवान्। (पृष्ठ 39)
सरलार्थ – यह गोपबन्धुदास महान् समाजसेवक थे। सत्यवादि- वनविद्यालय के अध्यापक, पाँच प्रसिद्ध मित्रों में विशेषतया स्वतन्त्रतासंग्रामी थे । ओडिशा प्रान्त के पुरी जनपद के साक्षीगोपाल के समीप सुआण्डो गाँव में जन्म लिया । अध्ययनकाल से ही उसने निर्धनों और रोगियों की सेवा की। सत्यवादि वनविद्यालय में वह छात्रों को बिना शुल्क पढ़ाते थे। अनपढ़ता को दूर करने के लिए वे निरन्तर प्रयत्न करते थे। सूती वस्त्र बनाने के लिए उन्होंने स्वयं सूत बनाया। जन्मभूमि की दुर्दशा को देखकर वह सदा चिन्ताग्रस्त रहते थे। महात्मा गांधी की प्रेरणा से भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन में गोपबन्धु ने भाग लिया। वह दो साल जेल में रहे।

(च) कारागारे निवसन् सः ‘बन्दीरआत्मकथा’, ‘कारा-कविता’, ‘धर्मपद’, ‘गो-माहात्म्य’, ‘नचिकेता-उपाख्यान’ इत्यादीनि बहुप्रेरणादायीनि पुस्तकानि ओडिआभाषया विरचितवान्। सर्वदा स्वदेशस्यैव वस्त्राणां वस्तूनां च उपयोगं कृतवान्। मरणासन्नं स्वपुत्रमपि विहाय जलप्लावपीडितान् भारतमातुः सहस्रशः पुत्रान् उद्धर्तुं गृहात् बहिः निर्गतः समाजमसेवत च। देशसेवातत्परस्य गोपबन्धुवर्यस्य प्रसिद्धं प्रेरणादायकं वचनमधुनापि जनमानसेषु राष्ट्रभक्तिं जागरयति । (पृष्ठ 39)
सरलार्थ – जेल में रहते हुए उन्होंने ‘बन्दीर आत्मकथा’, ‘काराकविता’, ‘धर्मपद’, ‘गोमाहात्म्य’, ‘नचिकेता उपाख्यान’ इत्यादि अत्यधिक प्रेरणादायी पुस्तकों की ओडिशा भाषा में रचना की। सदा अपने देश के वस्त्र और वस्तुओं का उपयोग करते थे। मृत्यु के निकट अपने पुत्र को भी छोड़कर बाढ़ पीड़ित भारत माता के हजारों पुत्रों का उद्धार करने के लिए घर से बाहर निकल पड़े और सेवा की। देश सेवा में तत्पर गोपबन्धु का प्रसिद्ध प्रेरणादायक वचन अब भी जनमानस में राष्ट्र भक्ति को जगा रहा है।
(छ) स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः,
स्वदेशलोकास्तदनु प्रयान्तु नु ।
स्वराज्यमार्गे यदि गर्तमालिका,
ममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा ॥ (पृष्ठ 41)
अन्वयः-मम तनुः स्वदेश भूमौ लीयताम्। तदनु स्वदेशलोकाः नु प्रयान्तु। यदि स्वराज्यमार्गे गर्तमालिका (अस्ति), सा तु मम अस्थिमांसैः परिपूरिता अस्तु ।
सरलार्थ – मेरा शरीर अपने देश की भूमि में लीन हो जाए। देशवासी मेरा अनुसरण करें। यदि स्वराज्य के मार्ग में गड्ढों की शृंखला हो तो वह मेरे हड्डी व माँस से पूर्ति हो ।
भावार्थ:- स्वदेशस्य भूमिभागे मम शरीरं विलीनं भवतु । देशवासिनः मम अनुसरणं कुर्वन्तु ।
देशस्य स्वतन्त्रतानिमित्तं यत्र यत्र प्रतिबन्धकाः गर्ताः सन्ति । ते सर्वे गर्ताः मम अस्थिभिः मांसैश्च परिपूर्णाः भवन्तु । (पृष्ठ 41 )
(ज) असौ सत्यवादि-वनविद्यालयस्य, दरिद्रनारायणसेवा- सङ्ङ्घस्य, सत्यवादि- मुद्रणालयस्य, समाज : इति दैनिक – वार्तापत्रस्य च प्रतिष्ठाता आसीत् । समाज : इति दिनपत्रिका शताधिकवर्षेभ्यः अधुनापि प्रतिदिनं प्रकाश्यते । समाजसेवायै देशसेवायै च तस्य असीमं त्यागमनुभवन् वैज्ञानिक: आचार्य: प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान् ।
उत्कलमणिरित्याख्यः प्रसिद्धो लोकसेवकः ।
प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः ॥
अन्वयः-उत्कलमणिः इत्याख्यः प्रसिद्धः लोकनायकः अयं देशभक्तः महामनाः गोपबन्धुः प्रणम्यः । (पृष्ठ 41 )
सरलार्थ – यह सत्यवादि वनविद्यालय, दरिद्रनारायण सेवासंघ, सत्यवादि मुद्रणालय और ‘समाज’ दैनिक समाचार पत्र का प्रतिष्ठाता था। ‘समाज’ यह दैनिक पत्रिका सौ से भी अधिक वर्षों से आज भी प्रतिदिन प्रकाशित की जा रही है। समाज सेवा और देशसेवा के लिए उसके अतुलनीय त्याग को अनुभव करते हुए आचार्य प्रफुल्ल चन्द्रराय ने गोपबन्धु को ‘उत्कलमणि’ उपाधि के द्वारा सम्मानित किया ।
‘उत्कलमणि’ (उपाधि से विभूषित), प्रसिद्ध लोकसेवक यह देशभक्त महापुरुष गोपबन्धु प्रणाम के योग्य हैं।