यह पाठ उपनिषदों में वर्णित ज्ञान के आधार पर सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन करता है। इस पाठ में बताया गया है कि प्राणियों की उत्पत्ति किस क्रम से हुई है। ब्रह्मा से आकाश की उत्पत्ति हुई है। आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी तथा पृथ्वी से अनाज और वृक्षादि की उत्पत्ति हुई । अनाज से भोजन की उत्पत्ति हुई और भोजन से ही समस्त प्रकार के प्राणी और मनुष्यों की उत्पत्ति हुई । आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी ये पंच महाभूत हैं। यह पाठ हमें अपनी भाषा एवं संस्कृति के प्रति भी जागरूक बनाता है।
इस पाठ में बताया गया है कि प्राणियों की उत्पत्ति किस क्रम से हुई है। ब्रह्मा से आकाश की उत्पत्ति हुई है। आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी तथा पृथ्वी से अनाज और वृक्षादि की उत्पत्ति हुई। अनाज से भोजन की उत्पत्ति हुई और भोजन से ही समस्त प्रकार के प्राणी, और मनुष्यों की उत्पत्ति हुई। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी ये पंच महाभूत हैं।
भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतं संस्कृतिः च । भारतस्य विशिष्टं प्राचीनं ज्ञानं संस्कृताश्रितं वर्तते । संस्कृतिः अपि संस्कृताश्रिता भवति । अस्माकं प्राचीनाः ऋषिमुनयः, विद्वांसः, गणितज्ञाः खगोलविज्ञानिनः, भूगर्भशास्त्रज्ञाः, शिल्पकलाप्रवराः, सङ्गीत – नाट्य-कलाविशारदाः, तन्त्रज्ञाननिपुणाः, आयुर्वेदादिवैद्यशास्त्र धुरन्धराः, जल वायु-प्रकृति- वातावरणज्ञाः, वास्तु- स्थापत्यकलाप्रवराः, जीवशास्त्रस्य, रसायनशास्त्रस्य, लोहशास्त्रस्य च विज्ञातारः, राजनीतिज्ञाः, अर्थशास्त्रज्ञाः, मनोविज्ञानिनः, तर्कनिष्णातारः, पाकशास्त्रविशिष्टाः, सौन्दर्यशास्त्रज्ञा:, नीतिशास्त्रनिपुणाः, विधिविधानपारङ्गताः, धर्मशास्त्रप्रवीणाः, सृष्टिविज्ञानज्ञाः आचार्याः भारतवर्षस्य यशः चतसृषु दिक्षु विस्तारितवन्तः । अधुना अपि संस्कृतग्रन्थान् आश्रित्य अनेके जना: वैज्ञानिकाः शोधं कुर्वन्तः सन्ति । भारतीय दर्शन – शास्त्रेषु, सृष्टेः उत्पत्तिविषये नैके विचारा: प्रतिपादिताः सन्ति । एतादृशाः प्रमुखाः विचाराः वैदिकवाङ्मये, लौकिकवाङ्मये च वर्तन्ते । तेषु सृष्टिक्रमस्य विषये वयं पठामः ।
सरलार्थ – भारत की प्रतिष्ठा संस्कृत और संस्कृति में है। भारत का विशेष प्राचीन ज्ञान संस्कृत पर ही आश्रित है। हमारी संस्कृति भी संस्कृत पर आश्रित है। हमारे प्राचीन ऋषि, मुनि, सारे विद्वान, गणित के जानकार, खगोल वैज्ञानिक, पृथ्वी के शास्त्र को जानने वाले, शिल्पकला में प्रवीण, संगीत – नाट्य कला को जानने वाले, तन्त्र ज्ञान (नाड़ी) में निपुण, आयुर्वेद आदि वैद्यशास्त्र में धुरन्धर (कुशल), जल – वायु और प्रकृति के वातावरण के जानकार, वास्तु- स्थापत्य कला में प्रवीण, जीवशास्त्र के, रसायन शास्त्र के, लोहशास्त्र के विशेष जानकारी रखने वाले, राजनीति के जानकार, अर्थशास्त्र के जानकार, मनोविज्ञान के जानकार, तर्क करने में निपुण, पाकशास्त्र (खाना बनाने में), सौंदर्य शास्त्र के जानने वाले, नीति शास्त्र में निपुण, विधि विधान में पारङ्गत (कुशल), धर्मशास्त्र में प्रवीण, सृष्टि विज्ञान के जानकार आचार्य भारतवर्ष के यश को चारों दिशाओं में फैलाए हुए हैं। आज भी संस्कृत ग्रन्थों का आश्रय लेकर अनेक (लोग) वैज्ञानिक खोज करने में लगे हुए हैं। सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में एक नहीं, अनेक विचार हैं। ऐसे प्रमुख विचार वैदिक साहित्य में और लौकिक साहित्य में हैं। उनमें सृष्टि क्रम के विषय में हम पढ़ते हैं।
(1)
(माता-पुत्र्योः संवादः)
पुत्री – अम्ब! मम काचिद् जिज्ञासा अस्ति । वयं मनुष्याः प्राणिनः कीटाः च कथं भूलोके आगताः ?
माता – वत्से! तदर्थं भवती प्रथमं पृथिव्याः उत्पत्तिक्रमं जानीयात् ।
पुत्री – अहो! रोचक स्यात् कृपया श्रावयतु ।
माता – अस्तु! प्रथमं ब्रह्मणः आकाशस्य उत्पत्तिः अभवत्।
पुत्री – ब्रह्म इत्युक्ते किम् अम्ब ?
सरलार्थ-
(माता-पुत्री का संवाद)
पुत्री – माँ! मेरी कुछ जानने की इच्छा है। हम सब मनुष्य प्राणी और कीड़े इस धरती लोक में कैसे आए?
माता – पुत्री ! उसके लिए तुम्हें पृथ्वी की उत्पत्ति के क्रम को जानना चाहिए।
पुत्री – ओह! रोचक होगी, कृपा करके सुनाओ।
माता – ऐसा है! सबसे पहले ब्रह्मा से आकाश की उत्पत्ति हुई ।
पुत्री – ब्रह्म से क्या तात्पर्य है माँ ?
(2)
माता – ब्रह्म इत्युक्ते चेतना-शक्ति, ऊर्जा वा या सर्वत्र व्याप्ता अस्ति । यथा – आकाशः अणुः च सर्वत्र व्याप्तः अस्ति।
पुत्री – अनन्तरम्?
माता – आकाशात् वायुः उत्पन्नः।
पुत्री – अम्ब! पृथिवी कदा उत्पन्ना?
माता – शृणोतु वदामि। वायो; अग्निः उत्पन्नः ।
पुत्री – एतत् सर्वं किमर्थम् अम्ब? साक्षात् मनुष्याणाम् उत्पत्तिं वदतु।
माता – अयि वत्से! एतत् सर्वं नास्ति चेत् कथं मनुष्याः प्राणिनः वा जीवन्ति ?
सरलार्थ – माता ब्रह्म यह कहने का अर्थ है ऊर्जा या शक्ति जो सब जगह स्थित है; जैसे अणु सब जगह स्थित है।
पुत्री – बाद में
माता – आकाश से हवा पैदा हुई ।
पुत्री – माता! पृथ्वी कब उत्पन्न हुई ?
माता – सुनो, बताती हूँ। वायु (हवा) से आग पैदा हुई।
पुत्री – ये सब किसलिए माँ ? सीधे मनुष्यों की उत्पत्ति बताओ।
माता – अरे पुत्री ! यदि ये सब नहीं होते तो मनुष्य या प्राणी कैसे जीवित रहते ?
(3)
पुत्री – जलम् आहारः वायुः च अस्ति चेत् पर्याप्तं खलु !
माता – आम्, अतः तेषामपि उत्पत्तिं जानातु ।
पुत्री – तर्हि अग्नेः कस्य उत्पत्तिः अभवत्?
माता – अग्नेः जलस्य उत्पत्तिः अभवत् ।
पुत्री – जलात् मनुष्यस्य उत्पत्तिः खलु ?
माता – नैव वत्से! जलात् पृथिव्याः उत्पत्तिः अभवत्।
पुत्री – अहो! सत्यम्, अहं विस्मृतवती एव । पृथिव्याः तु प्राणिनः मनुष्याः च उत्पन्नाः ।
माता – नहि नहि, पृथिव्याः ओषधीनां सस्यानां वृक्षादीनां च उत्पत्तिः अभवत् ।
पुत्री – अहो अद्भुतम्!
सरलार्थ-
पुत्री – पानी, भोजन और हवा निश्चित ही ये पर्याप्त हैं।
माता – हाँ, इसलिए उनकी भी उत्पत्ति जानो।
पुत्री – तो आग से किसकी उत्पत्ति हुई ?
माता – आग से पानी की उत्पत्ति हुई।
पुत्री – निश्चित ही पानी से मनुष्य की उत्पत्ति हुई।
माता – नहीं पुत्री ! पानी से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई ।
पुत्री – अहो! निश्चित ही सच है। मैं भूल ही गई। पृथ्वी से तो सारे प्राणी और मनुष्य उत्पन्न हुए हैं।
माता – नहीं, नहीं, पृथ्वी से औषधियों की, अनाजों की और पेड़-पौधों की उत्पत्ति हुई।
पुत्री – अहो आश्चर्य है।
(4)
माता – सस्येभ्यः आहारस्य उत्पत्तिः अभवत्।
पुत्री – आम्, आहारस्य उत्पत्तेः परं भूमौ सर्वमपि आगतम् एव । आहारात् कीटाः, प्राणिनः, मनुष्याः उत्पन्नाः खलु अम्ब?
माता – अहो ! मम पुत्री बहु चतुरा अस्ति। सत्यम् उक्तवती भवती ।
पुत्री – अम्ब! भवती एतत् सर्वं कथं जानाति ?
माता – अहम् आधुनिकं रसायनशास्त्रम् उपनिषद्-ग्रन्थान् च पठितवती ।
पुत्री – अहो! अहमपि उपनिषदं पठामि अम्ब!
माता – सत्यं वत्से! अवश्यम् उपनिषद्-ग्रन्थाः पठनीयाः । यतः अस्माकं भारतस्य मौलिकं ज्ञानं तेषु निहितम् अस्ति। तेन अस्माकं जीवनस्य अपि उत्कर्षः भविष्यति ।
सरलार्थ-
माता – अनाजों से भोजन की उत्पत्ति हुई ।
पुत्री – हाँ, भोजन की उत्पत्ति से भूमि पर सब कुछ ही आ गया। इसलिए भोजन से कीड़े, प्राणी और मनुष्य उत्पन्न हुए। माता?
माता – आह! मेरी बेटी तो बहुत होशियार है । सत्य कह रही हो आप।
पुत्री – माता! आप ये सब कैसे जानती हो ?
माता – मैंने आधुनिक रसायनशास्त्र और उपनिषद ग्रन्थों को पढ़ा है।
पुत्री – अहो! मैं भी उपनिषद् पढ़ती हूँ माता !
माता – सच पुत्री! ज़रूर ही पढ़ना चाहिए। क्योंकि हमारे भारत का मौलिक ज्ञान उनमें (उपनिषदों में) ही छिपा हुआ है। उनसे ही हमारे जीवन की भी उन्नति होगी।