रासो साहित्य

रैदास

रैदास का जन्म 1388 में काशी में हुआ | मध्यकालीन साधकों में विशेष स्थान इनी पत्नी का नाम लोना माना जाता है इन्होनें प्रयाग,मथुरा, वृन्दावन, भरतपुर, जयपुर, पुष्कर, और चितौड़ आदि स्थानों का भ्रमण किया सिकंदर लोधी के निमंत्रण पर दिल्ली भी आए थे | इन्हें मीराबाई और उदय का गुरु माना जाता है | […]

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संत काव्यधारा

संत कवि जन्म-मृत्यु जाति नामदेव 1135-1215 दरजी रैदास 1388-1518 चमार कबीर दास 1398-1518 जुलाहा जम्भ नाथ 1451-1523 राजपूत हरिदास निरंजनी 1455-1543 गुरुनानक 1469-1538 खत्री सींगा 1519-1659 ग्वाला लालदास 1540-1648 मेव दादू दयाल 1544-1603 धुनिया/ मोची मलूक दास 1574-1682 खत्री बाबा लाल 1590-1655 क्षत्रिय सुन्दर दास 1596-1689 बनिया

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निर्गुण भक्ति

ब्रह्म के दो रूप-निर्गुण और सगुण निर्गुण निराकार की भक्ति है इसमें ईश्वर घट-2 में रहता है यह ज्ञानमार्गी है रहस्यवाद भी निर्गुण पर ही आश्रित है यह भक्ति मूर्तिपूजा, कर्मकांड आदि आडम्बरों का विरोध करती है ज्ञान और प्रेम द्वारा एकाकार की प्राप्ति पर बल इसके पहले प्रवर्तक- महाराष्ट्र के नामदेव (13वीं सदी) हैं

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नामदेव

जन्म-मृत्यु= 1135-1215 महाराष्ट्र के नामदेव (13वीं सदी) हैं जो बिठोवा के भक्त थे | इनके गुरु का नाम विसोवा खेचर था यह पहले सगुण उपासक थे लेकिन बाद में नाथपंथ के सम्पर्क के कारण निर्गुण उपासक बन गए | इसकी दोनों तरह की रचनाएँ मिलती हैं | यह बारकारी सम्प्रदाय से सम्बन्ध रखते थे |

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निर्गुण-सगुण कवि और उनका काव्य

भक्तिकाल निर्गुण   सगुण     संत काव्यधारा सूफी काव्यधारा राम काव्यधारा कृष्ण काव्यधारा   निर्गुण भक्ति संतकाव्य धारा नामदेव कबीर रैदास   नानक   दादूदयाल   मलूकदास   सुन्दरदास   रज्जबदास अन्य कवि    ( प्रेमाश्रयी) सूफी काव्य मालिक मोहम्मद जायसी   मुल्ला दाउद   कुतुबन   मंझन कृष्ण काव्य का अर्थ एवं उत्पत्ति

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आलवार और नायनार संत

दक्षिण भारत के वैष्णवों को आलवार कहा जाता है |इनका सम्बन्ध केरल से है | इन्होने कृष्ण और राम दोनों की आराधना की | सर्वाधिक लोकप्रिय शठकोप थे | ये रामभक्ति के प्रथम कवि माने जाते हैं | शठकोप की प्रमुख रचनाएँ=तिरुवायमोलि , तिरुविरुतम और सहस्त्रगीति आदि | आलवारों ने आस्तिकता के लिए क्रान्ति की

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भक्ति आंदोलन का अखिल भारतीय स्वरूप और उसका अंतःप्रादेशिक वैशिष्ट्य

यह आन्दोलन सैंकड़ों वर्षों पहले से ही समाज में विकसित हो रहा था | यह गुजरात से लेकर मणिपुर और कश्मीर से कन्याकुमारी तकबहुसंख्यक भाषाओँ और बोलियों में अपनी संस्कृति को आत्मसात करता हुआ जनसामान्य को चेतनता प्रदान कर रहा था | उस समय व्यापरिक पूंजीवाद और सामंतवाद की पतनशीलता के कारण जनसामान्य के आस्था

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भक्ति काव्य के प्रमुख सम्प्रदाय

रामावत सम्प्रदाय प्रवर्तक- रामानन्द , जन्म-प्रयाग के कान्यकुबज ब्रह्मा कुल में 1368 (श्री भक्त सटीक के अनुसार) यशस्वी साधक व प्रगतिशील विचारक इनके गुर राघवानंद, व 12 शिष्य – अनंतानन्द, पीपा, कबीर, रैदास आदि बाहरी कर्मकांडों की बजाय अंतः साधना पर बल इन्होंने दशधा भक्ति ओर ज्ञानमार्ग का उपदेश दिया । श्री सम्प्रदाय प्रवर्तक- रामानुजाचार्य,

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भक्ति आंदोलन के उदय के सामाजिक ओर सांस्कृतिक कारण

भक्ति की प्रधानता के कारण इसे भक्तिकाल कहा जाता है |गिर्यसन महोदय ने इसे धार्मिक पुनर्जागरण कहा है | भक्ति का सर्वप्रथम उल्लेख “श्वेताश्वेतर उपनिषद” में मिलता है | गिर्यसन ने इसे हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग कहा है| रामविलास शर्मा ने-लोक जागरण काल हजारी प्रसाद द्विवेदी-लोक जागरण नामकरण साहित्यकार समयावधि मिश्रबंधु संवत् 1444-1560 विक्रम पूर्व

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