निर्गुण भक्ति

ब्रह्म के दो रूप-निर्गुण और सगुण निर्गुण निराकार की भक्ति है इसमें ईश्वर घट-2 में रहता है यह ज्ञानमार्गी है रहस्यवाद भी निर्गुण पर ही आश्रित है यह भक्ति मूर्तिपूजा, कर्मकांड आदि आडम्बरों का विरोध करती है ज्ञान और प्रेम द्वारा एकाकार की प्राप्ति पर बल इसके पहले प्रवर्तक- महाराष्ट्र के नामदेव (13वीं सदी) हैं … Read more

नामदेव

जन्म-मृत्यु= 1135-1215 महाराष्ट्र के नामदेव (13वीं सदी) हैं जो बिठोवा के भक्त थे | इनके गुरु का नाम विसोवा खेचर था यह पहले सगुण उपासक थे लेकिन बाद में नाथपंथ के सम्पर्क के कारण निर्गुण उपासक बन गए | इसकी दोनों तरह की रचनाएँ मिलती हैं | यह बारकारी सम्प्रदाय से सम्बन्ध रखते थे | … Read more

निर्गुण-सगुण कवि और उनका काव्य

भक्तिकाल निर्गुण   सगुण     संत काव्यधारा सूफी काव्यधारा राम काव्यधारा कृष्ण काव्यधारा   निर्गुण भक्ति संतकाव्य धारा नामदेव कबीर रैदास   नानक   दादूदयाल   मलूकदास   सुन्दरदास   रज्जबदास अन्य कवि    ( प्रेमाश्रयी) सूफी काव्य मालिक मोहम्मद जायसी   मुल्ला दाउद   कुतुबन   मंझन कृष्ण काव्य का अर्थ एवं उत्पत्ति … Read more

आलवार और नायनार संत

दक्षिण भारत के वैष्णवों को आलवार कहा जाता है |इनका सम्बन्ध केरल से है | इन्होने कृष्ण और राम दोनों की आराधना की | सर्वाधिक लोकप्रिय शठकोप थे | ये रामभक्ति के प्रथम कवि माने जाते हैं | शठकोप की प्रमुख रचनाएँ=तिरुवायमोलि , तिरुविरुतम और सहस्त्रगीति आदि | आलवारों ने आस्तिकता के लिए क्रान्ति की … Read more

भक्ति आंदोलन का अखिल भारतीय स्वरूप और उसका अंतःप्रादेशिक वैशिष्ट्य

यह आन्दोलन सैंकड़ों वर्षों पहले से ही समाज में विकसित हो रहा था | यह गुजरात से लेकर मणिपुर और कश्मीर से कन्याकुमारी तकबहुसंख्यक भाषाओँ और बोलियों में अपनी संस्कृति को आत्मसात करता हुआ जनसामान्य को चेतनता प्रदान कर रहा था | उस समय व्यापरिक पूंजीवाद और सामंतवाद की पतनशीलता के कारण जनसामान्य के आस्था … Read more

भक्ति काव्य के प्रमुख सम्प्रदाय

रामावत सम्प्रदाय प्रवर्तक- रामानन्द , जन्म-प्रयाग के कान्यकुबज ब्रह्मा कुल में 1368 (श्री भक्त सटीक के अनुसार) यशस्वी साधक व प्रगतिशील विचारक इनके गुर राघवानंद, व 12 शिष्य – अनंतानन्द, पीपा, कबीर, रैदास आदि बाहरी कर्मकांडों की बजाय अंतः साधना पर बल इन्होंने दशधा भक्ति ओर ज्ञानमार्ग का उपदेश दिया । श्री सम्प्रदाय प्रवर्तक- रामानुजाचार्य, … Read more

भक्ति आंदोलन के उदय के सामाजिक ओर सांस्कृतिक कारण

भक्ति की प्रधानता के कारण इसे भक्तिकाल कहा जाता है |गिर्यसन महोदय ने इसे धार्मिक पुनर्जागरण कहा है | भक्ति का सर्वप्रथम उल्लेख “श्वेताश्वेतर उपनिषद” में मिलता है | गिर्यसन ने इसे हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग कहा है| रामविलास शर्मा ने-लोक जागरण काल हजारी प्रसाद द्विवेदी-लोक जागरण नामकरण साहित्यकार समयावधि मिश्रबंधु संवत् 1444-1560 विक्रम पूर्व … Read more

पृथ्वीराज रासो

इसे “छंदों का अजायबघर” कहा जाता है | आचार्य शुक्ल ने इसे हिंदी का प्रथम महाकाव्य ओर इसके रचयिता चन्दरबरदाई को हिंदी का प्रथम कवि माना है।चन्दरवरदाई दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहाण के प्रमुख सामंत सलाहकार, मित्र ओर राज कवि थे| उन्होंने खुद को छः भाषाओँ का ज्ञाता बताया है| चंदरबरदाई इसे पूरा नहीं कर पाए … Read more

आदिकाल की विशेषताएँ एवं साहित्यिक प्रवृत्तियाँ

परिस्थितियां राजनीतिक परिस्थिति-युद्ध और अशांति का काल, हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद छोटे स्वतंत्र ( परमार, चौहान,चंदेल) राज्यों का उदय राजनीतिक अन्तः क्लेश के कारण शक्ति क्षीण, महमूद गजनबी(10 वीं सदी), मुहम्मद गोरी (12 वीं सदी) का आक्रमण 8-14 वीं सदी तक यह काल युद्ध, संघर्ष, अशांति, अराजकता, गृहक्लेश, विद्रोह का काल धार्मिक परिस्थिति-वैदिक, बौद्ध … Read more