इस पाठ में त्याग और बलिदान की प्रतीक पन्नाधाय की वीरता से हमें परिचित कराया गया है। वे राणा उदयसिंह की धाय माता थीं। जब राजमहल में उदयसिंह का जीवन खतरे में था, तो पन्ना ने अपने पुत्र चंदन को उनके स्थान पर सुलाकर उनके प्राणों की रक्षा की। बनवीर ने चंदन को राणा समझकर मार डाला । पन्नाधाय ने अपने देश के उत्तराधिकार की रक्षा करने के लिए अपने पुत्र तक का बलिदान दे दिया। यह कथा मातृत्व, निष्ठा, देशभक्ति और बलिदान का आदर्श उदाहरण है। पन्नाधाय का त्याग इतिहास में अमर है और यह हमें सिखाता है कि राष्ट्र और कर्तव्य के लिए व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठना ही सच्चा वीरत्व है।
यह भूमि मेरी माता है और मैं इसका पुत्र/पुत्री हूँ । इस सूक्ति को चरितार्थ किया है पन्नाधाय ने। उन्होंने स्वयं के विषय में न सोचकर देश हित को बड़ा माना है। पन्नाधाय ने अपने देश के उत्तराधिकार की रक्षा करने के लिए अपने पुत्र तक का बलिदान दे दिया। आइए, इस पाठ में हम ऐसी साहस, त्याग, वीरता और निष्ठा की अद्वितीया मूर्ति वीरांगना पन्नाधाय के बारे में जानें।
एषा भारतभूमिः वीराणां त्यागधनानां भूमिः अस्ति । सर्वे भारतीयाः ‘एषा भूमिः अस्माकं माता’ इति वदन्ति । अथर्ववेदे ‘माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ इति उक्तम् । मातृभूमेः रक्षणार्थं भारतीयाः सर्वस्वम् अर्पितवन्तः । एतादृशानां भारतीयानां गणनायां महिलानां प्रभूतं योगदानम् अस्ति। त्यागे वीरतायां च महिलाः शत्रुनिबर्हणाः आसन्। एतादृशीषु वीराङ्गनासु राजस्थानस्य पन्नाधाया काचिद् विशिष्टा वीराङ्गना आसीत्। एषा साहसस्य त्यागस्य निष्ठायाः च अद्वितीया मूर्तिः आसीत् । अस्मिन् पाठे तस्याः त्यागस्य पराक्रमस्य च वर्णनं कृतम् । एषा इतिहासस्य स्वर्णिमाक्षरैः लिखिता घटना अस्ति।
सरलार्थ-
यह भारतभूमि वीरों की (और) त्याग, बलिदान करने वालों की भूमि है। सभी भारतीय ‘यह भूमि हमारी माता’ है ऐसा बोलते हैं। अथर्ववेद में “माता मेरी भूमि है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ” ऐसा कहा गया है। मातृभूमि की रक्षा के लिए भारतीय सब कुछ अर्पित कर देते हैं। ऐसे भारतीयों की गिनती में महिलाओं का बहुत ज़्यादा योगदान है। त्याग (बलिदान) और वीरता में महिलाएँ शत्रुओं का विनाश करने वाली थीं। ऐसी वीर नारियों में राजस्थान की पन्नाधाय एक विशेष वीर नारी थी। वह साहस, बलिदान की और भक्ति की अद्वितीय मूर्ति थी। इस पाठ में उनके त्याग और बलिदान का वर्णन किया गया है। यह इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में लिखी गई घटना है।
(1)
षोडशे शतके मेवाडनगरे महाराणा – सङ्ग्रामसिंहः इति सुविख्यातः महाराजः आसीत् । तस्य द्वौ पुत्रौ विक्रमादित्यः उदयसिंहः च आस्ताम्। महाराणासङ्ग्रामसिंहस्य भ्राता पृथ्वीराजः । बनवीर : पृथ्वीराजस्य अष्टादशसु पुत्रेषु अन्यतमः ।
सः बनवीरः महाराणासङ्ग्रामसिंहस्य प्रथमं पुत्रं विक्रमादित्यं छलेन मारयित्वा मेवाडस्य शासनम् अकरोत् । ततः परमपि सः दुष्टबुद्धिः अचिन्तयत् यत्– “अहम् एकः एव उत्तराधिकारी भवेयम् । न कोऽपि मम प्रतिस्पर्धी स्यात्” इति।
अतः कदाचित् रात्रौ सः उदयसिंहं मारयितुं कुतन्त्रम् अरचयत्। तद् ज्ञात्वा पन्नाधाया उदयसिंहस्य शयनस्थाने स्वपुत्रं चन्दनं शायितवती । सा तस्य दुष्परिणामं जानाति स्म । बनवीर : उदयसिंहस्य शयनागारम् आगच्छत् । तत्र सुप्तः चन्दनः एव उदयसिंहः इति मत्वा बनवीरः चन्दनम् अमारयत् ।
सरलार्थ-
सोलहवीं शताब्दी में मेवाड़नगर में महाराणा संग्रामसिंह नामक एक प्रसिद्ध महाराजा थे। उनके दो पुत्र विक्रमादित्य और उदयसिंह थे। महाराणा संग्राम सिंह के भाई पृथ्वीराज थे। बनवीर पृथ्वीराज के अठारह पुत्रों में से एक था।
बनवीर ने महाराणा संग्राम सिंह के पहले पुत्र विक्रमादित्य को छल से मारकर मेवाड़ पर राज किया। उसके बाद उस दुष्ट बुद्धि ने सोचा कि – ‘मैं अकेला ही उत्तराधिकारी बन जाऊँ । कोई भी मेरा प्रतिद्वन्दी नहीं होना चाहिए ।
इसके बाद किसी रात में उसने उदयसिंह को मारने के लिए षडयंत्र रचा। यह जानकर पन्नाधाय ने उदयसिंह के सोने के स्थान पर अपने पुत्र चन्दन को सुलाया। वह ( पन्नाधाय ) उसके बुरे परिणाम को जानती थी। बनवीर उदयसिंह के सोने के कमरे में आया। वहाँ सोए हुए चन्दन को ही उदयसिंह मानकर बनवीर ने चन्दन को मार दिया ।
(2)
पन्नाधायायाः निर्णयः अकल्पनीयः आसीत् । ‘व्यक्तिहितं न, राष्ट्रहितम् एव श्रेष्ठम् इति सा जानाति स्म । तस्याः पुत्रस्तु दिवङ्गतः ‘ परं सा मेवाडराज्यं बनवीरस्य कुतन्त्रात् अरक्षत्।
कालान्तरे सः एव उदयसिंह: युद्धे बनवीरं हत्वा मेवाडराज्यस्य राजा अभवत् । तस्य पुत्रः एव पराक्रमी योद्धा महाराणाप्रतापः। सः प्रतापः शौर्येण भारतीयानां हृदये चिरं स्थानं प्राप्नोत् । कथ्यते एव – “ यदि पन्नाधाया स्वपुत्रस्य बलिदानं न अकरिष्यत् तर्हि उदयसिंह : न अभविष्यत्। यदि उदयसिंहः न अभविष्यत् तर्हि महाराणाप्रतापः अपि न अभविष्यत्”।
पन्नाधायायाः त्यागः शौर्यं च जगति आचन्द्रार्कं तिष्ठति । भारतीये इतिहासे वीराङ्गनानां गणनासु पन्नाधाया महत्तमं स्थानं प्राप्नोत् । पन्नाधायायाः बलिदानं सर्वान् शौर्य, राष्ट्रभक्तिं, कर्तव्यनिष्ठां, बलिदानं, विवेकं च शिक्षयति । उच्यते एव-
“यदि पन्नाधाया नाभविष्यत् तर्हि कुतो राणाप्रतापः ”
सरलार्थ-
पन्नाधाय का निर्णय कल्पना से परे था। स्वयं के हित से कहीं श्रेष्ठ देश का हित है, ऐसा वह जानती थी। उसका पुत्र तो मर गया। परन्तु उसने मेवाड़ राज्य की बनवीर के षड्यन्त्रों से रक्षा की। कुछ समय के बाद ही उदयसिंह युद्ध में बनवीर को मारकर मेवाड़ राज्य का राजा बना। उसका पुत्र ही पराक्रमी योद्धा महाराणा प्रताप हुआ। महाराणा प्रताप ने अपनी वीरता के कारण भारतीयों के हृदय में स्थान प्राप्त किया। कहा ही जाता है- यदि पन्नाधाय ने अपने पुत्र का बलिदान नहीं किया होता तो उदयसिंह न हुआ होता। यदि उदयसिंह नहीं हुआ होता तो महाराणा प्रताप भी नहीं हुआ होता ।
जब तक संसार में सूर्य एवं चन्द्रमा रहेंगे तब तक पन्नाधाय का त्याग, और वीरता भी रहेंगे। भारतीय इतिहास में वीर नारियों की गिनती में पन्नाधाय ने सबसे बड़ा स्थान प्राप्त किया । पन्नाधाय का बलिदान सबको वीरता, देशभक्ति, कर्त्तव्य के प्रति भक्ति, त्याग और अच्छे बुरे का ज्ञान करना सिखाता है। कहा जाता है-
“यदि पन्नाधाय नहीं होती तो राणा प्रताप कहाँ से होते । ”