‘सूक्ति’ शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है- ‘सुंदर कथन’। यह दो शब्दों ‘सु’ और ‘उक्ति’ के मेल से बना है। यह पाठ हमें संस्कृत की विभिन्न सूक्तियों के माध्यम से जीवन के महत्वपूर्ण सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों की शिक्षा देता है। इसमें बताया गया है कि स्वस्थ शरीर धर्म-पालन का पहला साधन है, इसलिए इसकी रक्षा करना आवश्यक है- ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।’ इसी प्रकार की अन्य महत्वपूर्ण सूक्तियाँ यहाँ दी गयी हैं। ये सूक्तियाँ विद्यार्थियों को सदाचार, स्वस्थ जीवन, मूल्य-आधारित व्यवहार और समाज में सच्चे संबंधों की ओर प्रेरित करती हैं। संस्कृत की इन सूक्तियों में गहन ज्ञान, सरलता और जीवनोपयोगी संदेश छिपा है।
सूक्ति शब्द सु + उक्ति से बना है, जिसका अर्थ है – सुंदर वचन या कथन । सूक्तियों में जीवन के विभिन्न मूल्यों को बताया गया है। हमें इन सूक्तियों में कही गई बातों को अपने आचरण में लाने का प्रयास करना चाहिए। इससे हमारा भला होता है । आइए, ऐसे कुछ मूल्यपरक एवं हितकारी सूक्तियों को पढ़ते हैं ।
एका छात्रा – आचार्य! अद्य मम माता माम् एकां सूक्तिं पाठितवती, ‘सत्यं वद, धर्मं चर’ इति ।
द्वितीया छात्रा – आचार्य ! ‘सूक्ति:’ इत्युक्ते कः अभिप्रायः ?
आचार्यः – सूक्तिः इत्युक्ते ‘सुन्दरं वचनम् ‘ । सूक्तिषु जीवनमूल्यानि निहितानि भवन्ति।
एकः छात्रः – महोदय! सूक्तयः अस्मान् सन्मार्गं प्रति नयन्ति इति अहं श्रुतवान् ।
आचार्यः – सत्यम्। सूक्तयः जीवने अस्माकं मार्गदर्शनं कुर्वन्ति । संस्कृतसाहित्ये सूक्तीनां भाण्डागारः अस्ति ।
द्वितीया छात्रा – आचार्य! अस्मासु कुतूहलं वर्धते । वयम् एताः सूक्तीः पठामः ।
आचार्यः – न केवलं पठामः अपितु स्मरामः, जीवने आचरामः च।
सरलार्थ-
एका छात्रा – गुरुजी ! आज मेरी माता ने मुझे एक सूक्ति ‘सत्यं वद, धर्मं चर’ पढ़ाई ।
द्वितीया छात्रा – गुरुजी !, ‘सूक्ति’ यह कहने का क्या मतलब (अर्थ) है?
आचार्य – सूक्तिः यह कहने का अर्थ है ‘सुन्दर वचन’। सूक्तियों में जीवनमूल्य निहित होते हैं।
एक छात्र – श्रीमान जी, सूक्तियाँ हमें श्रेष्ठ मार्ग की तरफ़ ले जाती हैं, ऐसा मैंने सुना है।
आचार्य – सच है। सूक्तियाँ जीवन में हमारा मार्गदर्शन करती हैं। संस्कृत साहित्य में सूक्तियों का भण्डार है ।
द्वितीया छात्रा – गुरुजी ! हममें जिज्ञासा बढ़ती जा रही है। हम यह सूक्तियाँ पढ़ते हैं।
आचार्य – न केवल पढ़ते हैं, बल्कि याद करते हैं और जीवन में आचरण करते हैं।
(1)
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः । ॥ १ ॥
पदच्छेदः – माता भूमिः पुत्रः अहम् पृथिव्याः ।
अन्वयः – भूमि: माता (अस्ति) अहं पृथिव्याः पुत्रः (अस्मि) ।
भावार्थ: – पृथ्वी अस्मान् माता इव लालयति पालयति च । अतः भूमिः अस्माकं सर्वेषां माता अस्ति । वयं सर्वे अस्याः पृथिव्याः सन्तानाः स्मः। एषा सर्वदा पूज्या अस्ति ।
अर्थ – भूमि माता है और मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूँ।
सरलार्थ-
पृथ्वी (भूमि) हमारा माता के समान प्यार और पालन करती है (लालन पालन करती है) । इसलिए भूमि हम सबकी माता है। हम सब इस पृथ्वी की सन्तान (बच्चे) हैं। यह हमेशा पूजा के योग्य है।
(2)
न रत्नमन्विष्यति, मृग्यते हि तत् ॥ २ ॥
पदच्छेदः – न रत्नम् अन्विष्यति मृग्यते हि तत् ।
अन्वयः – रत्नं न अन्विष्यति, तत् मृग्यते हि ।
भावार्थ: – हीरकादीनि रत्नानि ग्राहकस्य अन्वेषणं न कुर्वन्ति अपितु ग्राहकाः एव रत्नानाम् अन्वेषणं कुर्वन्ति । तथैव अस्मासु यदि गुणाः सन्ति तर्हि गुणज्ञाः स्वयमेव अस्मान् अन्विष्य आगच्छन्ति ।
अर्थ – रत्न स्वयं नहीं खोजता है, उसे खोजा जाता है।
सरलार्थ-
हीरे आदि रत्नों के ग्राहकों (खरीदने वाले की) की खोज नहीं की जाती बल्कि ग्राहक ही रत्नों की खोज करते हैं। वैसे ही हममें यदि कोई गुण हैं तो गुणों के जानने वाले हमें आकर ढूँढ़ ही लेते हैं।
(3)
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्॥३॥
पदच्छेदः – शरीरम् आद्यम् खलु धर्मसाधनम्।
अन्वयः – शरीरं खलु आद्यं धर्मसाधनम्।
भावार्थ: – यदि अस्माकं शरीरं स्वस्थम् अस्ति तर्हि वयं स्वकर्तव्यस्य पालनं कर्तुं शक्नुमः, अतः अस्माभिः स्वशरीरस्य रक्षा सर्वथा करणीया यतः शरीरम् एव धर्मपालनस्य प्रथमं साधनम् अस्ति ।
अर्थ- निश्चित ही शरीर, धर्म का सबसे पहला (प्रथम) साधन है।
सरलार्थ- यदि हमारा शरीर स्वस्थ (तंदुरस्त) है तो हम सब अपने कर्तव्य का पालन कर सकते हैं। हमें अपने शरीर की रक्षा हर प्रकार से करनी चाहिए क्योंकि शरीर ही धर्म (कर्तव्य) का पालन करने का सबसे पहला साधन है। अर्थात् यदि हमारा शरीर स्वस्थ होगा तब ही हम अपने कर्तव्य का निर्वाह उचित प्रकार से कर सकेंगे।
(4)
क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ॥४॥
पदच्छेदः – क्षणशः कणशः च एव विद्याम् अर्थम् च साधयेत् ।
अन्वयः – क्षणशः (एव) विद्यां कणशः एव अर्थं च साधयेत् ।
भावार्थ: – ज्ञानं प्राप्तुं समयस्य निरन्तरम् उपयोगः करणीयः । एकस्य अपि क्षणस्य नाशः न करणीयः । एवम् एव यदि कोऽपि धनस्य सङ्ग्रहं कर्तुम् इच्छति तर्हि सः निरन्तरं प्रत्येकं रूप्यकस्य सङ्ग्रहणं कुर्यात् । “ क्षणत्यागे कुतो विद्या कणत्यागे कुतो धनम्।”
अर्थ- क्षण-क्षण का उपयोग करके विद्या को और कण-कण का उपयोग करके धन को साध सकते हैं।
सरलार्थ- ज्ञान प्राप्त करने के लिए समय का लगातार उपयोग करना चाहिए। एक भी पल को नष्ट नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार यदि कोई भी व्यक्ति धन को एकत्रित करना चाहता है तो उसे लगातार एक – एक रुपये को एकत्र करना चाहिए। एक – एक पल को छोड़ने से ज्ञान (विद्या) प्राप्त नहीं हो सकता और न ही एक-एक रूपये को छोड़ने से धन संग्रह हो सकता है।
(5)
सुखार्थिनः कुतो विद्या, कुतो विद्यार्थिनः सुखम् ॥५॥
पदच्छेदः – सुखार्थिनः कुतः विद्या कुतः विद्यार्थिनः सुखम् ।
अन्वयः – सुखार्थिनः विद्या कुतः (भवेत्), विद्यार्थिनः सुखं कुत: (भवेत्) ।
भावार्थः – यः सदैव सुखम् इच्छति, परिश्रमं न करोति, अलसः अस्ति सः कथं विद्यां प्राप्तुं शक्नोति ? अतः यः ज्ञानं लब्धुम् इच्छति सः आलस्यं सुखं च त्यक्त्वा निरन्तरं विद्यार्जनं कुर्यात् ।
अर्थ- सुख चाहने वालों को विद्या कहाँ, विद्या चाहने वालों को सुख कहाँ ।
सरलार्थ- जो हमेशा सुख चाहता है। मेहनत नहीं करता है, आलसी है, वह कैसे विद्या प्राप्त कर सकता है? इसलिए जो (व्यक्ति) ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, उसे आलस और सुख को छोड़कर लगातार विद्या अभ्यास करना चाहिए ।
(6)
गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गं न च वयः ॥६॥
पदच्छेदः – गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गम् न च वयः।
अन्वयः – गुणिषु गुणा: (एव) पूजास्थानं (भवन्ति) लिङ्गं च न (भवति) वय: च न (भवति) ।
भावार्थ: – गुणानां सर्वदा एव आदरः भवति । गुणवान् जनः पुरुषः स्त्री वा भवेत्, बालः वृद्धः वा भवेत्, सः सर्वदा पूजनीयः एव भवति । आदरस्य कृते लिङ्गम् आयुः वा महत्त्वपूर्णं न भवति।
सरलार्थ-
गुणों का हमेशा ही आदर होता है। गुणवान व्यक्ति पुरुष हो या स्त्री, बालक (बच्चा) हो या बूढ़ा, वह हमेशा ही पूजा के योग्य (आदर के योग्य) होता है। आदर के लिए लिंग या आयु (उम्र) महत्वपूर्ण नहीं होती।
(7)
मा ब्रूहि दीनं वचः ॥७॥
पदच्छेदः – मा ब्रूहि दीनं वचः ।
अन्वयः – (त्वं) दीनं वचः मा ब्रूहि ।
भावार्थः – समाजे सर्वविधाः जनाः भवन्ति । केचित् साहाय्यं कुर्वन्ति । केचित् केवलं विकत्थनं कुर्वन्ति, अतः स्वाभिमानी जनः यस्य कस्यापि पुरतः साहाय्यस्य याचनां न कुर्यात् ।
अर्थ– दयनीय वचन नहीं बोलने चाहिए।
सरलार्थ- समाज में सब प्रकार के लोग होते हैं। कुछ सहायता करते हैं, कुछ केवल लंबी-चौड़ी बातें ही करते हैं। इसलिए स्वाभिमानी व्यक्ति को हर किसी के सामने सहायता की प्रार्थना नहीं करनी चाहिए।
(8)
यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान् ॥८॥
पदच्छेदः – यः तु क्रियावान् पुरुषः सः विद्वान् ।
अन्वयः – यः तु क्रियावान् पुरुषः सः विद्वान् (भवति) ।
भावार्थः – अर्जितस्य ज्ञानस्य जीवने आचरणेन, व्यवहारे च प्रयोगेण हि मनुष्यः वास्तविकः विद्वान् भवति न तु केवलम् अध्ययनेन । विद्या अनुकूल – कर्मणा विना व्यर्था भवति । ‘ज्ञानं भारः क्रियां विना ‘।
अर्थ- जो अर्जित किए गए ज्ञान को व्यवहार में प्रयोग करता है वही पुरुष विद्वान होता है ।
सरलार्थ- पढ़े हुए ज्ञान को जीवन में व्यवहार प्रयोग में लाने से ही मनुष्य वास्तव में विद्वान होता है केवल पढ़ाई करने से नहीं। पढ़ाई अगर व्यवहार में नहीं लाई जाए तो ऐसी पढ़ाई बेकार होती है, ऐसी विद्या काम के बिना भार बन जाती है। विद्या तो ऐसा धन है, जो जितना प्रयोग में लाओगे, उतना ही बढ़ेगा, नहीं तो भार बन जाएगा।
(9)
शीलं परं भूषणम् ॥९॥
पदच्छेदः – शीलम् परम् भूषणम्।
अन्वयः – शीलं परं भूषणम् (अस्ति) ।
भावार्थ: – मनुष्यस्य आचरणम् एव श्रेष्ठम् आभूषणम् अस्ति । सदाचारं विना अन्ये गुणाः निरर्थकाः भवन्ति ।
अर्थ- अच्छा आचरण सबसे बड़ा आभूषण है।
सरलार्थ- मनुष्य का व्यवहार (चरित्र) ही सबसे श्रेष्ठ आभूषण होता है। अच्छे आचरण के बिना दूसरे गुण बेकार होते हैं। अर्थात् मनुष्य चाहे जितना पढ़ा-लिखा हो, धनवान हो, परन्तु उसके पास यदि आचरण अच्छा नहीं है, तो उसके सारे गुण बेकार हैं।
(10)
हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः ॥१०॥
पदच्छेदः – हितम् मनोहारि च दुर्लभम् वचः ।
अन्वयः – हितं मनोहारि च वच: दुर्लभं (भवति) ।
भावार्थ: – केचन हितकारकं वचनं वदन्ति किन्तु तत् कठोरतया वदन्ति । केचन मनोरञ्जकं वाक्यं वदन्ति किन्तु तत् हितकारकं न भवति। तादृशं वचनं दुर्लभं भवति यत् हितकारकम् अपि स्यात्, मनोरमम् अपि स्यात्।
अर्थ – भले और मन को अच्छे लगने वाले वचन मुश्किल से मिलते हैं।
सरलार्थ-
संसार में कुछ लोग हितकारी वचन बोलते हैं परन्तु वे कठोरता से बोलते हैं। कुछ लोग मनोरंजक वाक्य बोलते हैं किन्तु वह हितकारी अर्थात् आपका भला करने वाला नहीं होता है। ऐसा वचन बहुत मुश्किल से मिलता है जो आपका भला भी करे और आपके मन को भी अच्छा लगे ।