Class 9 Sanskrit Chapter 2 स्वर्णकाकः

प्राचीन समय में किसी गाँव में एक निर्धन (ग़रीब) बुढ़िया स्त्री रहती थी। उसकी एक नम्र स्वभाव वाली और सुंदर बेटी थी। एक बार माँ ने थाली में चावलों को रखकर पुत्री को आज्ञा दी – सूर्य की गर्मी में चावलों की पक्षियों से रक्षा करो। कुछ समय बाद एक विचित्र कौआ उड़कर वहाँ आया।

उसके द्वारा ऐसा सोने के पंखों वाला और चाँदी की चोंच वाला सोने का कौआ पहले नहीं देखा गया था। उसको चावलों को खाते और हँसते हुए देखकर लड़की ने रोना शुरू कर दिया। उसको हटाती हुई उसने प्रार्थना की-चावलों को मत खाओ। मेरी माँ बहुत गरीब है। सोने के पंख वाला कौआ बोला, शोक मत करो। सूर्योदय से पहले गाँव के बाहर पीपल के वृक्ष के पीछे तुम आना। मैं तुम्हें चावलों का मूल्य (कीमत) दे दूँगा। प्रसन्नता से भरी लड़की नींद भी नहीं ले पाई।

सूर्योदय से पहले ही वह (लड़की) वहाँ पहुँच गई। वृक्ष के ऊपर देखकर वह आश्चर्यचकित हो गई कि वहाँ सोने का महल है। जब कौआ सोकर उठा तब उसने सोने की खिड़की से झाँककर कहा–अरे बालिका! तुम आ गई, ठहरो, मैं तुम्हारे लिए सीढ़ी को उतारता हूँ, तो कहो सोने की, चाँदी की अथवा ताँबे की, किसकी उतारूँ? कन्या बोली-मैं निर्धन (ग़रीब) माँ की बेटी हूँ। ताँबे की सीढ़ी से ही आऊँगी। परंतु सोने की सीढ़ी से वह स्वर्णभवन में पहुँची।

बहुत देर तक भवन में चित्रविचित्र (अनोखी) वस्तुओं को सजी हुई देखकर वह हैरान रह गई। उसको थकी हुई देखकर कौआ बोला-पहले थोड़ा नाश्ता करो-बोलो तुम सोने की थाली में भोजन करोगी या चाँदी की थाली में या ताँबे की थाली में? लड़की बोली-ताँबे की थाली में ही मैं ग़रीब भोजन करूँगी (खाना खाऊँगी)। तब वह कन्या और आश्चर्यचकित हो गई जब सोने के कौवे ने सोने की थाली में (उसे) भोजन परोसा। ऐसा स्वादिष्ट भोजन आज तक उस लड़की ने नहीं खाया था। कौआ बोला-हे बालिका (लडकी)! मैं चाहता हूँ कि तुम हमेशा यहीं रहो परंतु तुम्हारी माँ अकेली है। तुम जल्दी ही अपने घर को जाओ।

ऐसा कहकर कौए ने कमरे के अंदर से तीन बक्से निकालकर उसको कहा- हे कन्या! अपनी इच्छा से एक संदूक ले लो। सबसे छोटी संदूक को लेकर लड़की ने कहा-यही मेरे चावलों की कीमत है। घर आकर उसने संदूक को खोला, उसमें बहुत कीमती (मूल्यवान) हीरों को देखकर वह बहुत खुश हुई और उसी दिन से वह धनी हो गई।

उसी गाँव में एक दूसरी लालची बुढ़िया स्त्री रहती थी। उसकी भी एक बेटी थी। ईर्ष्या से उसने उस सोने के कौए का रहस्य जान लिया। सूर्य की धूप में चावलों को रखकर (फैलाकर) उसने भी अपनी बेटी को उसकी रक्षा के लिए बिठा (नियुक्त कर) दिया। वैसे ही सोने के पंख वाले कौए ने चावलों को खाते हुए उसको (लड़की को) भी या। सबह वहाँ जाकर वह कौए को बरा-भला कहती हई बोली- हे नीच कौए! मैं आ गई हूँ, मुझे चावलों का मल्य दो। कौआ बोला- मैं तुम्हारे लिए सीढी उतारता हूँ। तो कहो सोने से बनी हुई, चाँदी से बनी हुई अथवा ताँबे से बनी हुई। घमंडी लड़की बोली- सोने से बनी हुई सीढ़ी से मैं आती हूँ परंतु सोने के कौए ने उसे ताँबे से बनी हुई सीढ़ी ही दी। सोने के कौए ने उसे भोजन भी ताँबे के बर्तन में कराया।

वापस होते समय सोने के कौए ने कमरे के अंदर से तीन पेटियाँ (संदूकें) उसके सामने रख दीं। लालची लड़की ने सबसे बड़ी पेटी ले ली। घर आकर व्याकुल वह जब संदूक खोलती है तो उसमें अचानक काला साँप देखा। लालची लड़की ने लालच का फल पाया। उसके बाद उसने लालच छोड़ दी।

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