अपनी रचनाएँ

स्थानांतरण

स्थानांतरित अध्यापकों को समर्पित शिक्षण के इस पेशे में आना और जाना है कोशिश कर लो कितनी भी , कहाँ यहाँ कोई पक्का ठिकाना है कल आए से हिचकिचाए से , इस लिए ही तो आज भरे मन से चले जाना है जैसे बसाया था यहाँ एक लघु संसार- सा सालों में , आगे भी […]

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फेसबुक(facebook.)

फेसबुक पर आई दोस्तों की बहार है कुछ जाने पहचाने कुछ अनजाने चेहरों की बहार है कुछ से सिखने को मिलता है बहुत कुछ कुछ के पास चंद फोटो और शेयर इट का जुगाड़ है कुछ रच रहे हैं इतिहास ज्ञान के संग्रह का कुछ अकेले ही पड़े सूखे पत्तों से निराश हैं किसी ग्रुप

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कवितायेँ

तबादला नीति बनी जी का जंजाल, वर्तमान में बिगड़ता गृहस्थ जीवन, महिला उत्थान में एक पहल- प्रवीण कुमार सिसवाल मैं, दो सखियाँ, ओ माँ , छड्ड दिला वो बचपन , बुजुर्गों की आँखें  मुर्दों के संसार में,  आज को जो दौर,  Facebook और Whatsapp,  शिक्षक,  हारती जिंदगियों, फेसबुक, मातृभाषा , स्थानांतरण   -सुखविन्द्र   

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