भक्ति आंदोलन का अखिल भारतीय स्वरूप और उसका अंतःप्रादेशिक वैशिष्ट्य

यह आन्दोलन सैंकड़ों वर्षों पहले से ही समाज में विकसित हो रहा था | यह गुजरात से लेकर मणिपुर और कश्मीर से कन्याकुमारी तकबहुसंख्यक भाषाओँ और बोलियों में अपनी संस्कृति को आत्मसात करता हुआ जनसामान्य को चेतनता प्रदान कर रहा था |

उस समय व्यापरिक पूंजीवाद और सामंतवाद की पतनशीलता के कारण जनसामान्य के आस्था और विश्वास में कमी आ रही थी | अतः लोग इश्वर के सहारे आध्यात्मिक उन्नति के साथ सामाजिक मानव समानता को स्थापित करना चाहते थे |

भक्ति आन्दोलन के उद्भव तथा अखिल भारतीय प्रसार के बारे में अनेक विद्वानों के मत इस प्रकार है-

  1. गिर्यसन-इसाइयत की देन
  2. आचार्य शुक्ल-इस्लामी आक्रमण की प्रतिक्रया
  3. हजारी प्रसाद द्विवेदी-भारतीय चिंतनधारा का स्वभाविक विकास
  4. गजानन माधव मुक्तिबोध-ऐतिहासिक-सामाजिक शक्तियों के रूप में जनता के दुखों व कष्टों से हुआ
  5. रामविलास शर्मा- भक्ति आन्दोलन एक जातीय और जनवादी आन्दोलन है
  6. इसाई मत का प्रभाव
  7. भारतीय चिंतनधारा का स्वभाविक विकास
  8. नगरीकरण की प्रतिक्रिया स्वरूप
  9. सामाजिक रुढियों और असमानता के विरुद्ध
  10. आध्यात्मिक उन्नयन
  11. सम्पूर्ण भारत में एक समान आन्दोलन जैसे- महाराष्ट्र में नामदेव, पंजाब में नानक, उत्तर प्रदेश में रैदास, कबीर, इसी प्रकार 12 वीं सदी में कर्नाटक में वीर शैव मत तथा लिंगायत

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