परमाल रासो

इसे आल्हाखंड के नाम से भी जाना जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे बैलेड तथा ड़ा० राम कुमार वर्मा ने इसे वीरगाथा काव्य कहा है।कुछ विद्वान इसे “विकासशील लोककाव्य” कहते हैं ।जनता में अत्यधिक लोकप्रियता को देखते हुए गिर्यसन ने इसे वर्तमान युग का सबसे लोकप्रिय महाकाव्य माना है।लेकिन इसकी प्रामाणिकता अभी तक उपलब्ध नहीं है।इसके रचयिता जगनिक हैं जो महोबा नरेश परमर्दि एवं के आश्रित थे।इस काव्य में महोबा देश के दो लोकप्रसिद्ध वीरों आल्हा ओर ऊदल के वीर चरित्र को यथार्थ ढंग से प्रस्तुत किया गया है।इसके द्वारा की गए विभिन्न युद्धों का बड़ी उत्तेजक भाषा में वर्णन किया गया है।इसमें आल्हा या वीर छंद का प्रयोग किया गया हैं।इसकी भाषा बैसवाड़ी है।यह काव्य शिक्षित समाज की अपेक्षा अशिक्षित या अल्पशिक्षित समाज में अधिक लोकप्रिय रहा है।यह एक गेय काव्य है जो सदैव गायकों की परम्परा द्वारा ही विकसित होता रह है।इसकी मूल प्रेरणा वैयक्तिक वीर भावना, स्वाभिमान, दर्द ओर साहसपूर्ण भावना का वर्णन करना रही है। एक उदाहरण

“ बारह बरिस है कुकूरजिएँ, औ तेरहलै जिएँ सियार।

बरिस अठारह छत्री जिएँ, आगे जीवन को धिक्कार।,

सदा तरैया न बन फूलै, मारो सदा न सावन होय।

स्वर्ग मडैया सब काड़ूँ को, यारो सदा न जीवै कोय ।।

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