टंट्या भील

टंट्या भील के डाको का हाल बहुते से मनुष्यों ने सुना; है पर यह पुरुष, किस तरह डाकू बनने के लिये मजबूर हुआ, यह कथा मनोरंजक होने के साथ ही जरा दुखभरी भी है । टंट्या भील का वास्तविक नाम टंड्रा था, पर यह नाम बिगड़ते-बिगड़ते टंट्या हो गया । बाद में इसी नाम ने प्रसिद्धि पायी । इसलिये हम भी इसे टंट्या के नाम से ही याद करेंगे ।

 

टंट्या भील का जन्म


टंट्या भील जन्म सन् 1842 ई० में नीमाड़ के निकट विरदा ग्राम में भाऊसिंह नामक भील के यहाँ हुआ था । विरदा ग्राम से कुछ दूर पोखर में भाऊसिंह काश्तकारी करता था । उसकी वहाँ पुश्तैनी जमीन थी । उसका पुत्र टण्ड्रा या टंट्या बचपने से ही बड़ा बलवान, निडर और उद्योगी था । जब वह तीस वर्ष का हुआ, तब भाऊसिंह का देहान्त हो गया । उसकी माता का देहान्त पहले ही हो चुका था।

भाऊसिंह जब मरे, तब फ़सल की दशा बहुत ही खराब हो गयी थी, इस लिये टंट्या लगान न दे सका । मालगुज़ार शिवा पटेल ने बक़ाया लगान की बात करके टंट्या की पैतृक जायदाद से सदा के लिये बेदखल कर दिया । किन्तु बेदखली का हुक्म हो जाने पर भी टंट्या भील ने अपनीं ज़मीन जोतनी न छोड़ी । विरोध करने वालों को वह डराने-धमकाने लगा । मालगुजार शिवा पटेल तथा उसके साथी अन्य पोखर निवासी टंट्या को फँसाने के मन्सूबे बाँधने लगे । अन्त मे दण्ड विधान की धारा १०७ के अनुसार बदमाशी में टंट्या का चालान किया गया ।

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उसे प्रथम बार एक वर्ष सपरिश्रम कारावास का दण्ड मिला । क़ैद से छूटने पर टंट्या भील जब फिर पोखर पहुँचा, तब पोखर-निवासी उसे हर तरह से परेशान करने लगे । टंट्या लाचार होकर एक दूसरे गाव में जाकर प्रायः साढ़े सात वर्षे तक मजूरी करके जीवन निर्वाह करता रहा । किन्तु पोखर गाँव के दुष्ट निवासियों ने टंट्या को सताना न छोड़ा । उसे एक चोरी के अपराध में सन्देह पर पकड़ा दिया । अपने को निर्दोष गिरफ्तार होते देख टंट्या बड़ा क्रुद्ध हुआ और पुलिस वालों से उसकी खुब हाथापाई और लड़ाई हुई । अदालत से वह चोरी के अपराध में निर्दोष छूट गया; पर पुलिस से झगड़ने के कारण उसे तीन मास की कड़ी कैद हुई; किन्तु इस बार छूटने पर पोखर निवासियों ने उस फिर चोरी के इलजाम में पकड़वाना चाहा । टंट्या इस बार भी बिलकुल निर्दोष था; पर जब उसने पुलिस के आगमन की खबर सुनीं, तो उसने भागने की फ़िक की । उसे पोखर निवासियों पर बड़ा क्रोध चढ़ा और अब वह उनसे बदला लेने के लिये पागल सा हो गया।

 

टंट्या भील का डाकू बनाना


टंट्या भील उस समय अकेला था ,पर पुलिस के भूतों से बचने के लिये उसे कुछ साथियों की जरूरत हुई । नीमाड़ ज़िले के खजुरी ग्राम में बिजनिया नामक एक भील रहा करता था । यह भील स्वभाव से ही बड़ा भीमकाय, क्रुर हिंसक और देखने में बडा़ भयानक था । टंट्या इस भील से मिला । दोनों की राय पक्की हो गयी और ये दोनों मिलकर अपने साथियों का दल बढ़ाने लगे। धीरे-धीरे यह दल बढ़ गया और टंट्या तथा बिजनिया के नेतृत्व में दल के सब साथी घने जंगल-पहाड़ों में रहने लगे ।

लूट-मार करना और डाके डालना ही उनका मुख्य काम था । उन्होने पोखर निवासियों का धन चुराया और बहुत तरह उन्हें परेशान किया । एक दिन पोखर के एक पटेल ने टंट्या भील और उसके साथियों को मिथ्या सहानुभूति और मीठे प्रलोभन देकर अपने गाँव में बुलाया । टंट्या, बिजनिया और इनका एक तीसरा बहादुर साथी दोपिया जब गाँव में पहुँचे, तब उस विश्वासघाती पटेल ने उन तीनों को चोरी के अपराध में पकड़वा दिया । सन् 1889 ई० में इन तीनों पर मामला चला, जिसमें पोखर के प्रमुख व्यक्तियों ने गवाहियाँ दी थीं । तोनों को कठोर कारावास-दण्ड मिला और वे खंडवा के जेलखाने में रखे गये ।

 

टंट्या भील का जेल से भागना


जेल में कुछ दिन रहने के बाद टंट्या भील ने वहाँ से निकल भागने की एक युक्ति सोची । जेल में अन्य दस भील भी सजा भुगत रहे थे । टंट्या ने अपने साथी दोपिया की मदद से अपनी कोठरी के ऊपर की दीवार में एक छेद किया । वह छेद बढ़ा लिया गया और उसी मोखे में से अर्धरात्रि में एक-एक भील बाहर कूद आया; कम्बल भी वे साथ ही बाँध लाये थे । अन्त में टंट्या भील भी बाहर निकल आया, और जेल की बुर्ज पर से गम्भीर गर्जना करता हुआ और अपने भागने की सूचना अधिकारियों को देता हुआ निकल भागा । इसके बाद जेल के अधिकारियों में बड़ी खलबली मची; कई सिपाही उन्हें पकड़ने के लिये पीछे दौड़े; पर टंट्या भील की गर्द भी कोई न पा सका ।

अंग्रेज सरकार के मज़बूत जेलखाने से निकल भागने पर अधिकारी लोग बहुत घबराये और टंट्या को एक बड़ा खतरनाक डाकू समझने लगे । इसके बाद टंट्या भील सचमुच ही एक भयानक डाकू् हो गया ।उसने सैकड़ों धनियो को लूटा; पर वह उदार इतना था, कि गरीबो को वह सदा आर्थिक सहायता दिया करता था । अब उसका दल भी बहुत बड़ा हो गया था, जो बाक़ायदा सब काम करता और टंट्या के नेतृत्व में डाके डालता था । उसने अपने शत्रुओं से बदला भी खूब लिया । पोखर निवासियों की करतूतों को वह भूला न था । एक दिन वहाँ उसने अचानक आक्रमण करके सारा गाँव भस्म कर दिया और उस दुष्ट पटेल को पकड़ कर निर्दयता-पूर्वक मार डाला , पर उसके स्त्री, बच्चों को कोई कष्ट न दिया ।

टंट्या भील ने सन् 1878 से 1889 तक नीमाड़ तथा अंग्रेजी और होल्करी इलाके में प्रायः चार सौ डाके डाले; पर वह कभी पकड़ा न गया । पुलिस हैरान थी । एक-से-एक दत्त कर्मचारियों को निष्फलता हुई । टंट्या के डाके डालने का मुख्य उद्देइय अमीरों को लूटना और गरीबों को धन देना था । वह अपने शत्रुओं के प्रति बड़ा ही निर्दय था; पर गरीबों को आश्रय देता तथा गौ-ब्राह्मण का प्रतिपालक था । गाँव के लड़के जब उसे मामा टंडा या मामा टंट्या कहते, तो वह प्रसन्न होकर उन्हें धन देता था ।

सन् 1871 के बाद टंट्या भील के भयानक डाकों से शक्तिशाली अंग्रेज-सरकार और होलकर-सरकार शंकित हो उठी । उसे पकड़ने के लिये पुलिस का एक बहुत बड़ा दल नियुक्त किया गया । इस दल का नाम ही टंड्रा पुलिस था । सन् 1880 के बाद टंट्या के दो मुख्य सरदार दोपिया और बिजनिया पकड़े गये, जिनमें से एक को आजन्म कारावास और दूसरे को प्राणदण्ड दिया गया ।

सन् 1881 के बाद टंट्या ने अनेक स्थानों में डाके डाले । एक मौके पर तांतिया दल का सामना पुलिस दल से हो गया । दोनों ओर से गोलियाँ चलीं । इसके बाद शस्त्रधारी एक राजपूत-पलटन का दल भी पहुँच गया; पर टंट्या-दल के रण-कौशल से वे सब परास्त होकर भागे । राजपूतों का प्रधान सरदार मारा गया । इस विजय के बाद टंट्या ने सारा गाँव भस्म कर दिया और चला गया । वह इतने दूर-दूर डाके डालता था, कि पुलिस हैरान होकर सोचती, कि उसे कहाँ पकड़े ? टंट्या कितने ही पुलिस अफसरों से स्वयं अकेले भेंट करता और किसी-न-किसी तरह उन्हें धोखा देकर भटकाता और फिर निकल भागता था ।

एक बार वह हज्जाम के रूप में एक थानेदार की हज़ामत बनाने आया, और उसकी नाक काटकर चलता हुआ । इस तरह टंट्या वर्षों पुलिस को छकाता रहा । अब उसको आयु 45 वर्ष की हो चुकी थी और लड़ते-लड़ते वह भी थक गया था ।

 

टंट्या भील का पकड़ा जाना


अन्त में सन् 1888 के बाद गणपति नाम के एक मनुष्य ने उसे धोखे से पकड़वा दिया । टंट्या भील उसे अपना मित्र समझता था; पर मित्र ने उसके साथ विश्वासघात किया और रक्षा बन्धन के दिन उसे गिरफ्तार कराया । टंट्या के छः साथियों ने बहुसंख्यक पुलिस से खूब लड़ाई की; पर ताँतिया गिरफ्तार होने से न बच सका ।

 

टंट्या भील टंट्या भील की मृत्यु


सन् 1888 की 26 सितम्बर को जबलपुर के डिप्टी कमिश्नर के सामने वह पेश किया गया । उसके सारे अंग लोहे की जंजीरों से जकड़े हुए थे , जैसे शेर बंधा हुआ हो । उसे प्राण दण्ड की आज्ञा हुई और अक्टूबर या नवम्बर में वह फाँसी पर लटका दिया गया । जनता ने उसे क्षमा करने के लिये सरकार से प्रार्थना भी की थी; पर ऐसा भयानक वीरात्मा कैसे छोड़ा जाता ? टंट्या भील को आज भी लोग मध्यप्रदेश में ” टंट्या मामा” के न नामसे याद किया करते हैं ।

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