गुल्ली डंडा

यह कहानी फ़रवरी 1924 में हंस पत्रिका में प्रकाशित हुई थी ।यह कहानी बाल मनोविज्ञान ओर असमान सामाजिक पृष्ठभूमि पर आधारित है ।बचपन की यादों को लेकर यह कहानी लिखी गई है ।इस कहानी के मुख्य पात्र हैं- गया, मतई, मोहन,दुर्गा आदि। लेखक को याद है कि किस तरह गया चमार गुल्ली डंडे का का सबसे बड़ा खिलाड़ी था । वह शरीर से इतना मजबूर नहीं है परंतु इस खेल में उससे आगे कोई नहीं था । एक बार लेखक को गया बहुत पदाता है। लेखक बहुत बहाने बनाता है परंतु गया उसे अपनी बारी पूरी करने को कहता है। फिर लेखक उसे याद दिलाता है कि गत दिवस उसने उसे अमरूद खिलाया था । लेकिन गया उसकी कोई बात नहीं सुनता है । अंत में दोनों में कहासुनी हो जाती है ओर वह गया को गालियाँ दे देता है इस पर गया उसे थप्पड़ मार देता है । अंत में लेखक रोने लगता है । इस तरह उसकी जान छूटती है अपनी बारी देने से । लेखक उच्च वर्ग से सम्बंधित व थानेदार का बेटा है पर वह थप्पड़ की बात अपने घर में नही बताता है । यहाँ लेखक ने बताया है कि बचपनों में समाजीकरण आधार हावी नहीं होता । लेखक जब बीस साल बाद इंजीनियर बनकर उसी स्थान पर आता है तो बचपनों की यादें जीवित हो जाती हैं। वह वहाँ खेल रहे एक बच्चे से गया चमार के बारे में पूछता है । वह बच्चे के द्वारा उसे बुलवा लेता है । दोनों की अवस्था में काफ़ी परिवर्तन आ चुका है । दोनों फिर से गुल्ली डंडा खेलना चाहते हैं । इसलिए दोनों गाँव से दूर जाकर पेड से डंडा तोड़कर गुल्ली डंडा बनाकर फिर से खेलते हैं। लेखक देखता है कि गया में अब वो बात नहीं रही शायद इसलिए कि उसका अभ्यास छूट गया होगा क्योंकि गया एक मज़दूर था जिसे अपने परिवार का गुज़ारा चलाने के लिए प्रतिदिन मज़दूरी करनी पड़ती थी। लेखक कई बार आउट हो जाता है लेकिन बार बार न आउट होने की बात कहता है जिसे गया मान लेता है । अंत में शाम को लेखक गया को भी खेलने का अवसर देता है । जाते हुए गया लेखक को कल होने वाले गुल्ली डंडे के मुक़ाबले के लिए लेखक को आमंत्रित करता है। अगले दिन जब लेखक मैच देखता है तो पाता है कि गया ग़जब का खेल दिखाता है , तो लेखक तुरंत समझ जाता है कि कल वह गया को नहीं खेला रहा था बल्कि गया उसे खेला था ।

कहानी के संवाद नाटकीय ओर चुटीले हैं। इसमें लम्बे छोटे दोनों प्रकार के संवादों का प्रयोग किया गया है । तत्सम के साथ उर्दू शब्दों का भी प्रयोग किया गया है । कहानी की भाषा सरल, सहज, विषयानुकूल व प्रभावमयी है।कहानी जा संदेश यही कि पद प्रतिष्ठा ओर आर्थिक स्थित असमान होने पर भी मनुष्य के बीच नैसर्गिक समानता समाप्त हो जाती है ।व्यवहार बदल जाता है।असमानता से अनजान गुल्ली डंडा एक सस्ता, स्वास्थ्यवर्धक भारतीय खेल है ।

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