रीतिकाल का अर्थ और नामकरण

रीतिका अर्थ पद्धति, शैली और काव्यांग निरुपण से है।साहित्य को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा गया है-प्राचीन काल, मध्यकाल और आधुनिक काल। फिर पुन मध्यकाल को दो भागों में बांटा गया है- पूर्व मध्यकाल (भक्ति काल) उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल) | 1643 विषय 1843 वीं तक के कालखंड को रीतिकाल कहा गया है।

नामकरण

अलंकृत काल-मिश्र बंधुओं द्वारा, श्रृंगार काल-विश्व नाथ प्रसाद मिश्र द्वारा और रीतिकाल यह नाम आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने दिया है।

मिश्र बंधुओं द्वारा दिया गया अलंकृत काल सही नहीं लगता है क्योंकि इस काल में कविता को अलंकृत करने पर अधिक बल।दिया गया है। इसलिए इसका नाम अलंकृत काल होना चाहिए। किंतु इस काल में लक्षण ग्रंथों की रचना प्रचुर मात्रा में हुई है।

श्रृंगार काल कहे जाने के पक्ष में यह तर्क दिया गया है कि इस काल में कवियों की व्यापक प्रवृत्ति श्रृंगार वर्णन की थी। किंतु शृंगारी कवियों ने भी काव्य-निरुपण की ओर रुचि दिखाई है। काव्य चर्चा इस काल की सामान्य प्रवृत्ति थी और कवि अगर उसमें वैसा ही आनंद लेते थे, जैसा भक्ति काल में ब्रह्मज्ञान चर्चा में लिया जाता था।

ऐसे ग्रंथ जिनमें काव्यांगों के लक्षण एवं उदाहरण दिए जाते हैं रीतिग्रंथ कहलाते है।रीतिकाल के अधिकांश कवियों ने रीति निरुपण करते हुए लक्षण ग्रंथ लिखे हैं।इस काल की प्रधान प्रवृति निरूपण को माना जा सकता है।आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कालो के नामकरण उनकी प्रधान प्रवृत्ति के आधार पर किए हैं।इसलिए उन्होंने रीति की प्रधानता के कारण इस कालखंड का नाम रीतिकाल किया है

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