दूध का दाम

मुन्शी प्रेमचंद द्वारा रचित चर्चित कहानी दूध का दाम जुलाई 1934 में हंस पत्रिका में प्रकाशित हुई।यह कहानी सामाजिक वैषम्य, वर्णाश्रम भेद, जात-पात, ऊँच-नीच, छुआछूत जैसी समस्याओं पर आधारित है। यह कहानी ग्रामीण क्षेत्र में चिकित्सकीय सुविधाओं की बदहाल अवस्था को भी इंगित करती है। गांव के अस्पतालों में अच्छे डॉक्टर, नर्सों के अभाव में भंगिने प्रसव कराती है। कहानी की नायिका मूंगी दलित स्त्री है।वह साफ-सफाई के साथ साथ प्रसव भी कराती है। उसके पति का नाम दमडी और बेटे का नाम मंगल है।मंगल कहानी का नायक है क्योंकि वही फल का भोक्ता है।महेश बाबू एक शिक्षित, सभ्य, धनी व्यक्ति हैं।उनकी पत्नी का प्रसव मूंगी कराती है। उनकी पत्नी को दूध नहीं उतरता। इसलिए मूंगी उनके बेटे सुरेश को दूध पिलाती है।जबकि मंगल ऊपर के दूध पर पलता है।बच्चे को दूध पिलाने के कारण मूंगी महेश बाबू के घर बहुत सम्मान पाती है।लेकिन छुआछूत, जाति, धर्म उसके सुखी जीवन में आड़े आते हैं।पंडित मोटेराम शास्त्री सामाजिक वर्जनाओं, धर्म की दुहाई देकर मूंगी को उसके सम्मान-आसन से उतार फेंकती है।जबकि पंडित मोटेराम शास्त्री स्वयं भंगिन के दूध पर पले बढ़े हुए हैं।मूंगी का पति प्लेग में और मूंगी सर्पदंश से मृत्यु प्राप्त करते हैं। रह जाता है अनाथ मंगल | जो महेश बाबू के घर की जूठन पर पलता है।उसे लगता है कि सुरेश को पिलाए गए दूध का दाम चुकाया जा रहा है।प्रेमचंद के कथा साहित्य में पशुओं को एक विशेष स्थान दिया गया है।कहानी में टोमी कुत्ते और मंगल की प्रगाढ़ मित्रता दर्शाकर लेखक दोनों की किस्मत एक जैसी ही बताता है।सारे अपमान, तिरस्कार, ताने, मार, भूख के सामने ठहर नहीं पाते।मंगल और टोमी दूध का दाम लेना स्वीकार कर लेते हैं।यह कहानी संवेदना को गहरे स्तर तक छूती है और वैचारिकता को बुरी तरह झकझोर देती है।कहानी की भाषा।शैली, कथोपकथन, देश, काल आदि मिलकर कहानी नहीं वरन एक चित्र का निर्माण करते हैं जो आस पास घटित होता अनुभव होता है।कहानी का उद्देश्य समाज को संकीर्ण विचारधारा, सामाजिक विसंगतियो से मुक्त कराना है जिससे कोई मंगल दूध के दाम के रूप में झूठन स्वीकार करने पर विवश न हो। 

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