ईदगाह

प्रेमचंद द्वारा रचित ईदगाह कहानी1933 में चाँद पत्रिका में प्रकाशित हुई।ईद का कहानी बाल मनोविज्ञान की कहानी है।यह मुस्लिम समाज की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इसमें लेखक ने मुसलमानों के सबसे बड़े और पवित्र त्योहार ईद का और ईदगाह जाने का जीवंत चित्रण किया है।कहानी का नायक नन्हा हामिद है।उसकी उम्र महज 4-5 साल की है, लेकिन परिस्थितियों ने उसमें जिस मानसिकता का निर्माण किया, वह संवेदना जागृत करती है।कहानी का पात्र हामिद मात्र तीन पैसे लेकर मेला देखने जाता है।हामिद अपने भाग्य को नहीं खोजता, ना ही अपने साथियों की समृद्धि से जलता है।यह हामिद का अपना आत्मसंघर्ष है जो वह खिलौने न लेकर अपनी दादी की जल जाती उँगलियों का स्मरण कर चिमटा खरीदता है। हामिद का यह आत्मसंयम उसे अपने साथियों में श्रेष्ठ सिद्ध करता है और उसके खरीदे हुए चिमटे को भी। हामिद के साथी (महमूद, मोहसिन, नुरे, सम्मी) हमउम्र एक जाति और वर्ग से संबंधित है, लेकिन लेखक आर्थिक आधार पर उन्हें दो वर्गों में अलग वर्गसंघर्ष का भी रंग भर देता है। मेले में महमूद वकील, मोहसिन भिश्ती, नुरे वकील, सम्मी धोबिन रूपी मिटटी खिलौने खरीदते हैं | हामिद का चिमटा सभी को रुस्तमे हिन्द लगता है | वह सब बच्चे हामिद के तर्कों से परास्त हो जाते है | सबको लगता है कि हामिद को चिमटे के कारण दुआएं मिलेगीं| कहानी की भाषा शैली, देश, काल, वातावरण सब जीवंत जान पड़ते हैं। मेले का इतना सजीव चित्रण है कि पढ़ते समय पाठक को अनुभव होता है कि वह भी मेले का हिस्सा है।कहानी के अंत में बूढ़ी दादी अमीना की दुआओं मिश्रित आंसू कहानी को संजीदगी प्रदान करते हैं। ईदगाह कहानी प्रेमचंद द्वारा रचा गया कोरा आदर्श नहीं वरन यथार्थ है जो हमें सामाजिक पृष्ठभूमि की यथार्थता से परिचित कराता है।कहानी के मध्य से मितव्ययता और सादगी की जो सीख नन्हें हामिद ने दी है वह दुर्लभ है।इस कहानी को कालजयी बनाती है। कहानी का उद्देश्य है आशावाद और आस्था की स्थापना है।यह मनुष्य को अभाव में प्रसन्न बनाए रखते हैं।

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